Happy Dipawali

Happy Dipawali
Be happy

Tuesday, October 11, 2011

गजल सम्राट जगजीत सिंह

गजल सम्राट जगजीत सिंह का आज चंदनवाड़ी में अंतिम संस्‍कार कर दिया गया। ब्रेन हैमरेज के चलते करीब 15 दिन अस्‍तपाल में रहने के बाद सोमवार (10 अक्‍टूबर) को उनका निधन हो गया था। लेकिन बताया जाता है कि यह उनके निधन का तात्‍कालिक कारण था। असल में उनका निधन उस दर्द के चलते हुआ, जो उन्‍हें जवान बेटे की मौत के बाद मिला था।
मशहूर गायिका आशा भोंसले के मुताबिक जगजीत कभी भी लोगों के साथ अपना दुख नहीं बांटते थे और न ही लोगों के सामने उसे जाहिर होने देते थे। वह याद करती हैं कि जब उनके बेटे के निधन के बाद उन्‍हें सांत्‍वना देने गई थीं, तब उन्‍होंने कहा था कि इस बारे (बेटे की मौत) में बात नहीं करें। बकौल आशा, वह सारा गम अपने सीने में दबा कर रखते थे और शायद इसका उनकी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा।

1990 में जगजीत और चित्रा के बेटे विवेक की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उसके बाद जगजीत को जुबां पर गीत लाने में छह महीने लग गए थे और चित्रा की आवाज तो खामोश ही हो गई थी। चित्रा दो साल पहले अपनी बेटी को भी खो चुकी हैं। उनकी पहली शादी से जन्‍मी मोनिका ने बांद्रा के अपने फ्लैट में खुदकुशी कर ली थी।

जगजीत शुरू से ही अंतरमुखी स्‍वभाव के थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि किशोरावस्था में वे एक लड़की पर फिदा हो गए थे। जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था। लड़की के घर के सामने साइकिल की चेन टूटने या हवा निकलने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे। बहरहाल, उनका यह प्यार परवान नहीं चढ़ सका था।

जगजीत सिंह के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है कि कपड़े प्रेस करना उनकी हॉबी थी। उन्हें घुड़दौड़ का भी बहुत शौक था, उन्होंने घोड़े पाले भी थे। बचपन में फिल्मों के शौक के चलते अक्सर सिनेमाहॉल में गेटकीपर को घूस देकर घुसते थे।

चैरिटी के अनेक कार्यों में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। कई समाजसेवी संस्थाओं के सहायतार्थ गाया। ‘क्राई फॉर क्राई’ एलबम भी निकाला। मेहदी हसन के इलाज के लिए उन्होंने पाकिस्तान जाकर तीन लाख रुपए की मदद की थी। अपने संघर्ष के दिनों को याद कर नए कलाकारों की मदद के लिए तैयार रहते थे।  


कहां तुम चले गए... 

जन्म 8 फरवरी, 1941 को श्रीगंगानगर (राजस्थान) में। जन्म के समय पिता ने नाम दिया जगमोहन, पर अपने गुरु की सलाह पर बाद में कर दिया जगजीत।

पीडब्ल्यूडी में कार्यरत, पिता अमर सिंह पंजाब में दल्ला गांव के मूल निवासी थे और मां थीं बचन कौर। आर्थिक हालात ये थे कि बकौल जगजीत, ‘पतंग और रेडियो भी लक्जरी हुआ करते थे।’ शुरुआती साल बीकानेर में बीते, फिर श्रीगंगानगर लौटे।

पिता ने पं. छन्नूलाल शर्मा से संगीत की शिक्षा लेने भेजा। फिर छह साल उस्ताद जमाल खान से भी तालीम ली। कॉलेज के दिनों में एक रात चार हजार की भीड़ के सामने गा रहे थे कि बिजली चली गई। साउंड सिस्टम बैटरी के जरिए चालू रहा। जगजीत गाते रहे और क्या मजाल कि अंधेरे के बावजूद कोई उठकर गया हो!

स्नातक शिक्षा के लिए वे डीएवी जालंधर पहुंचे। यहां आकाशवाणी ने उन्हें ‘बी’ वर्ग के कलाकार की मान्यता दी। 1962 में जालंधर में ही उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए स्वागत गीत रचा।

1961 में वे मुंबई पहुंचे। संघर्ष में पैसे खत्म हो गए थे। इसी हालत में ट्रेन के शौचालय में छुपकर बिना टिकट जालंधर गए।

मार्च 1965 में वे दुबारा मुंबई लौटे। सस्ती जगह पर रहते थे। खटमलों के साथ सोते थे। एक रात तो चूहे ने पैर काट खाया।

छोटी-मोटी महफिलों, घरेलू आयोजनों, फिल्मी पार्टियों, विज्ञापन जिंगल्स आदि में गाते थे। इसी बीच एचएमवी ने एक रिकॉर्ड के लिए उनसे दो गजलें गवाईं। इसी के कवर पर छपने वाले चित्र के लिए उन्होंने पहली बार दाढ़ी और पगड़ी हटाई।

एक जिंगल की रिकॉर्डिंग के दौरान अपनी भावी जीवन संगिनी चित्रा दत्ता से मिले। 19६९ में बिना धूम-धड़ाके, रिसेप्शन या उपहार के उनकी शादी हो गई। शादी पर खर्च हुए कुल जमा 30 रुपए।

एक कमरे के मकान में रहते थे। 1971 में पुत्र विवेक का जन्म। आर्थिक मजबूरियां ऐसी कि चित्रा ने 20 दिन के बच्चे को गोद में लेकर माइक पर जिंगल गाया। बावजूद इसके जगजीत महसूस करते थे कि तब वे ‘दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति’ थे।

1975 में एचएमवी से पहला एलपी ‘द अनफॉरगेटबल्स’ आया। इसकी रिकॉर्ड कामयाबी के बाद उन्होंने मुंबई में फ्लैट खरीदा।

1980 में फिल्म ‘साथ-साथ’ और ‘अर्थ’ में स्वर और संगीत दिया। 1987 में उनका ‘बियॉन्ड टाइम’ देश का पहला संपूर्ण डिजिटल सीडी एलबम बना। अगले साल टीवी सीरियल ‘मिर्जा गालिब’ में स्वर और संगीत दिया।

28 जुलाई, 1990 को एकमात्र पुत्र विवेक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद आध्यात्मिकता और दर्शन की ओर झुकाव बढ़ा। पहला एलबम आया ‘मन जीते जगजीत’ (गुरबानी)।

संगीत के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता कि 2001 में मां के अंतिम संस्कार के बाद उसी दोपहर कोलकाता में पूर्व निर्धारित कॉन्सर्ट के लिए पहुंचे।

2003 में पद्मभूषण सम्मान मिला।

नई दिशा (1999) व संवेदना (2002) के लिए प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के गीतों को सुर और संगीत दिया।


10 मई, 2007 को संसद के केंद्रीय कक्ष में प्रस्तुति दी।


लोकप्रिय एलबम 
इकोज, द अनफॉरगेटबल्स, माइलस्टोन, कम अलाइव, द लेटेस्ट, बियॉन्ड टाइम, साउंड अफेयर, कहकशां, मिर्जा गालिब (सभी चित्रा सिंह के साथ) फेस टू फेस, लाइव विद जगजीत सिंह, मरासिम, मिराज, इनसाइट, क्राई फॉर क्राई, मां, सांवरा, हे राम।
यादगार गजलें 
सरकती जाए है रुख से नकाब.., ये दौलत भी ले लो.., किया है प्यार जिसे.., मेरी जिंदगी किसी और की.., कोई चौदहवीं रात का चांद बनकर.., चराग आफताब गुम.., झूम के जब रिंदों ने पिला दी.., पहले तो अपने दिल की रजा जान जाइए.., मैं नशे में हूं.., अपने होंठों पर सजाना चाहता हूं.., जब किसी से कोई गिला रखना.., सच्ची बात कही थी मैंने.., कोई पास आया सवेरे-सवेरे...।
लोकप्रिय गीत 
होंठों से छू लो तुम...(प्रेमगीत), झुकी झुकी सी नजर..(फिल्म अर्थ) तुमको देखा तो...(साथ-साथ), तुम इतना जो मुस्करा रहे हो...(अर्थ), फिर आज मुझे तुमको...(आज), हमसफर बनके हम...(आशियां), चिट्ठी न कोई संदेश...(दुश्मन), होशवालों को खबर क्या...(सरफरोश)।
 

Friday, October 7, 2011

काश! बेटियों के लिए भी सजे बंदनवार

एक जर्नल के पन्ने पलटते हुए नजर छोटे-से विज्ञापन पर गई। विज्ञापन के सबसे निचले हिस्से पर लिखा हुआ था - ‘कपूर एंड डॉटर्स’। अब तक शर्मा एंड संस, गुप्ता एंड संस, ठाकुर एंड संस जैसे फर्मो के नाम देखने की ही आदत रही है। इसलिए यह छोटा-सा बदलाव सुखद भी था और प्रतीकात्मक भी।


बदलाव बाबा आदम के जमाने से चले आ रहे हैं। इतिहास कई बड़े बदलावों का साक्षी रहा है। लेकिन बदलाव वे ही नजर आते हैं, जो भौतिक रूप से घटित होते हैं। जैसे 64 साल पहले लाल किले पर तिरंगे का लहराना। बड़ा राजनीतिक बदलाव। साफ नजर आया। हाल के वर्षो में कार्यस्थलों पर महिलाओं की संख्या का बढ़ना। महिलाएं कार्यस्थलों पर दिख रही हैं। इसलिए माना जा सकता है कि बदलाव हुआ है, एक बड़ा सामाजिक बदलाव। लेकिन दिमाग के भीतर बदलाव न तो इतनी आसानी से होता है और न ही साफ नजर आता है। क्या बेटियों या महिलाओं के प्रति जो नजरिया है, वह बदला है? केवल पुरुषों के दिमाग मंे ही नहीं, महिलाओं के दिमाग में भी। इसलिए किसी फर्म के साथ अगर ‘डॉटर्स’ शब्द जुड़ता है तो यह भौतिक बदलाव के साथ-साथ शायद मानसिकता में बदलाव का भी संकेत है। हालांकि यह पर्याप्त नहीं है।



पिछले दिनों मध्यप्रदेश के चंबल क्षेत्र के कुछ गांवों के भ्रमण का मौका मिला। यह क्षेत्र लड़कियों के साथ भेदभाव के लिए बदनाम रहा है। आंकड़े अक्सर इसकी पुष्टि करते हैं। लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कम हो रही है। कन्या पैदा ही नहीं हो, इसके लिए कई तरह के जतन किए जाते हैं। छोटी-छोटी कन्याओं को किस तरह से मारा जाता है, इसे लेकर क्षेत्र में कई कहानियां प्रचलित हैं। लड़के के पैदा होने पर जश्न-सा माहौल होता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि बेटा पैदा होने पर ‘चरुआ’ मनाया जाता है। इसमें चौदह दिनों तक लड़के की मां को पोषण तत्वों से युक्त पदार्थ खिलाए जाते हैं। लेकिन लड़की होने पर लगता है मानो परिवार मंे गमी हो गई हो।


बच्ची की मां भी ‘आत्मग्लानि’ में तीसरे-चौथे दिन से काम में जुट जाती है। इसके पीछे निश्चित तौर पर ऐतिहासिक कारण रहे होंगे, लेकिन लगता है वे सामाजिक परिस्थितियों के साथ रच-बस गए हैं। यही परिस्थितियां बेटों के प्रति ललक को न्यायसंगत ठहराती हंै और यह सिलसिला लगातार चलता जाता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं, परिस्थितियां और उनके तर्क अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन घर में पैदा होने वाली बेटी को ‘लक्ष्मी’ कहने के बावजूद अधिकांश लोगों में यह मलाल अक्सर रहता है कि काश, लड़का होता!


कुछ चीजें शायद कभी नहीं बदलेंगी। जैसे विदाई हमेशा लड़की की होगी, लड़के की नहीं। सुरक्षा से जुड़ी दिक्कतें भी प्राय: लड़कियों के साथ ही रहेंगी। शायद दहेज जैसी सामाजिक बुराइयां भी आने वाले सालों में लड़कियों के माता-पिता के लिए समस्या बनी रहेंगी। लेकिन फिर भी बहुत कुछ बदला जा सकता है। अगर महिलाओं के प्रति सामाजिक बोध बदला जा सके, तो कन्या पूजन के लिए नवरात्रि के नौ दिनों का इंतजार करने की जरूरत नहीं रहेगी। हिंदी बेल्ट के एक मुख्यमंत्री बेटी बचाओ अभियान शुरू कर रहे हैं।

अच्छी बात है, लेकिन सच तो यह है कि सामाजिक समस्याओं के समाधान सरकारी अभियानों में नहीं होते। स्वयं समाज ही इसका समाधान हो सकता है। आज की बेटी, जो कल मां भी होगी और सास भी, के जिम्मे भी आने वाली बेटियों का सम्मान और अस्मिता रहेगी।

और चलते-चलते.. मेरे मित्र की एक बेटी है। उससे वे बहुत प्यार करते हैं। वे अक्सर कहते हैं, मेरे लिए तो यह बेटे जैसी है। क्या हमारा कोई मित्र कभी अपने बेटे के लिए यह कह सकेगा, यह तो मेरी बेटी जैसा है!

http://www.bhaskar.com/article

Tuesday, October 4, 2011

चुकंदर सबसे फायदेमंद



चुकंदर सबसे फायदेमंद सब्जियों में से एक है। नियमित रूप से सलाद या जूस के रूप में इसे लेने के अनेक फायदे हैं। एनिमिया के रोगियों के लिए यह विशेष लाभकारी है क्योंकि इसमें अच्छी मात्रा में लौह, विटामिन और खनिज होते हैं जो रक्तवर्धन और शोधन के काम में सहायक होते हैं। इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट तत्व शरीर को रोगों से लडऩे की क्षमता प्रदान करते हैं। यह प्राकृतिक शर्करा का स्त्रोत होता है। इसमें सोडियम, पोटेशियम, फॉस्फोरस, क्लोरीन, आयोडीन, और अन्य महत्वपूर्ण विटामिन पाए जाते हैं। चुकंदर में गुर्दे और पित्ताशय को साफ करने के प्राकृतिक गुण हैं।

चुकंदर का रस रक्त वाहिनियों को फैला देता है और इससे शारीरिक सक्रियता के दौरान मांसपेशियों की ऑक्सीजन की आवश्यकता कम हो जाती है। लोगों की उम्र बढऩे या उनमें ह्वदय परिसंचरण तंत्र को प्रभावित करने वाली स्थितियां निर्मित होने पर उनमें व्यायाम के दौरान अंदर ली जाने वाली ऑक्सीजन की मात्रा में नाटकीय रूप से कमी आ जाती है। अगर उम्र बढऩे के साथ आपकी सक्रियता में कमी आ रही है तो आपकी इस समस्या का इलाज है रोज एक ग्लास चुकंदर का जूस।जूस बढ़ती उम्र के लोगों की सिकुड़ती हुई धमनियों को फैलाए रखने में मदद करता है।चुकंदर के जूस में पाया जाने वाला नाइट्रेट ब्लडप्रेशर को कम करता है। हाइब्लडप्रेशर के मरीजों के लिए चुकंदर वरदान है।

चुकंदर का जूस मानव शरीर में खून बनाने की प्रक्रिया में उपयोगी होता है। आयरन की प्रचुरता के कारण यह लाल रक्त कोशिकाओं को सक्रिय और उनकी पुर्नरचना करता है। यह एनीमिया के उपचार में विशेष रूप से उपयोगी होता है। इसके सेवन से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। गैसट्रीक अल्सर के उपचार के दौरान सुबह नाश्ते से पहले एक गिलास चुकंदर के जूस में एक चम्मच शहद को मिलाकर चुकंदर के नियमित सेवन से कब्ज से बचा जा सकता है। यह बवासीर के रोगियों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है। रात में सोने से पहले एक गिलास या आधा गिलास जूस दवा के तौर पर पीना फायदेमंद होता है। किडनी और पित्ताशय विकार में चुकंदर के रस में गाजर और खीरे के जूस को मिलाकर पीना उपयोगी होता है। सफेद चुकंदर को पानी में उबाल कर छान लें। यह पानी फोड़े, जलन और मुहांसों के लिए काफी उपयोगी होता है। खसरा और बुखार में भी त्वचा को सा करने में इसका उपयोग किया जा सकता है।

मंदी के नाम पर और कितना शोषण?

मंदी के नाम पर और कितना शोषण?

विश्व के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मंदी के बादल लगभग छंट चुके हैं। भारत के वित्त मंत्री भी घोषणा कर चुके हैं कि फिर से रोजगार के नए अवसर खुलने लगे हैं। परंतु भारत के मध्यम निजी कंपनियों और कुछ उच्च कंपनियों में अभी मंदी का दौर खत्म नहीं हुआ है? मंदी के बहाने अबतक सैकड़ों कंपनियां हजारों लोगों को बाहर का रास्ता दिखा चुकी है। उनलोगों पर गाज अधिक गिरी, जिनके वेतन अधिक थे। कम वेतन वाले तो कुछ सुरक्षित बच गए परंतु अधिक वेतन वाले बेकाम हो गए। मंदी के बहाने फायदे में चली रही कंपनियों ने भी छंटनी के नाम पर कर्मचारियों का जमकर दोहन किया। काम के घंटे बढ़ा दिए जबकि तनख्वाह में फूटी कौड़ी भी बढ़ोतरी नहीं की। गोपनीय आंकड़ों पर गौर किया जाए तो सैकड़ों कंपनियों ने दो वर्षों से मंदी के नाम पर अपने किसी कर्मचारी को 'इन्क्रीमेंट' तक नहीं दिया है। यदि किसी कर्मचारी ने हिम्मत करके अपनी बात रखने की कोशिश की तो नौकरी से निकाल देने की धमकी मिलती है। ऐसे में ये कर्मचारी किससे शिकायत करें, कहां जाएं, अंधी सरकार तो पहले से ही कंबल ओढ़कर सोई हुई है? महंगाई पहले से घरों में समा चुकी है। भारत की एक बड़ी कंपनी की शाखा बिहार में भी है। यहां के कई ऐसे कर्मचारियों से जबरन इस्तीफा ले लिया गया, जो बीस साल से अधिक समय से उस कंपनी में बने हुए थे। इनका कार्य भी बेहतर माना जाता रहा है। इनके बॉस ने कहा कि या तो इस्तीफा दें, वर्ना कोई इल्जाम लगाकर निकाल दिया जाएगा। मजबूर होकर कर्मचारियों को इस्तीफा देना पड़ा। एक दशक पहले तक बड़ी कंपनियों में नौकरी 'पर्मानेंट' होती थी। किसी कर्मचारी को हटाना आसान भी नहीं था। अब सभी कंपनियों में नौकरी 'कांट्रेक्ट' पर दी जा रही है, जिसे कंपनी जब चाहे हटा दे रही है। इसका कहीं विरोध नहीं हो रहा क्योंकि सरकार ही पक्ष में खड़ी है। इधर, हजारों कर्मचारी डर के साये में नौकरी कर रहे हैं। मंदी की दस्तक के साथ ही कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को न सिर्फ डराया बल्कि जमकर शोषण भी किया और कर रहे हैं। आसमान छूती महंगाई ने कम वेतन पाने वालों के घर से दाल की कटोरी गायब कर दी है। गृहणियां अपने पतियों से उलझ रही हैं कि खर्च कैसे चलाएं? इसका जवाब निजी कंपनी के कर्मचारियों के पास नहीं है। हालांकि कर्मचारियों के मस्तिष्क में एक बात अवश्य तैर रही है कि मंदी के नाम पर उनका और कितना शोषण किया जाएगा? कांट्रेक्ट पर बहाली करते वक्त ही कंपनियां कर्मचारियों से लिखता लेती है कि यदि उनका कार्य ठीक-ठाक नहीं रहा तो उन्हें 'कांट्रेक्ट' की अवधि के पूर्व भी हटाया जा सकता है। ऐसे में खामोश रहना इनकी मजबूरी है, लेकिन कब तक?

बच्चों को इतनी आजादी?

बच्चों के यौवन पर दाग लगने से रोकिए!


समय के साथ तेजी से बदल रहा लोगों का मन-मिजाज। परंतु पृथ्वी व चांद, सूरज वहीं है, ठीक इसी तरह स्त्री-पुरुष में आज भी भेदभाव कायम है। स्त्री चाहे जिस मुकाम पर पहुंच जाए, उसे पुरुष के सामने झुकना ही पड़ता है। अभी के दौर में आधुनिकता के नाम पर लड़कियां जींस-शर्ट अधिक पसंद कर रही हैं। इसी तरह हाईस्कूल तक पहुंचते ही अधिकतर लड़कियों का झुकाव युवा लड़कों की ओर हो जा रहा है। कॉलेज में पढऩे वाली लड़की का यदि ब्यॉय फ्रेंड नहीं है तो इसे अपमान समझा जा रहा है। वहीं, लड़के तो लड़कियों से दोस्ती करने के लिए बेचैन दिखते हैं। किशोर से युवा की तरफ बढऩे के साथ ही विपरीत सेक्स की ओर रुझान आम बात है। परंतु दिक्कत वहां से शुरू होती है, जब कोई अठारह वर्ष का युवक व युवती एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैं। करीब ये दोस्ती में नहीं बल्कि पति-पत्नी की तरह संबंध बनाने के लिए आते हैं। इस वक्त इन्हें मां-बाप, भाई-बहन या फिर समाज का कोई ख्याल नहीं आता। इनका कैरियर बर्बाद हो जाएगा, ये कहीं के नहीं रहेंगे, इस बात का होश भी कच्ची उम्र के चलते इन्हें नहीं रहता। संबंध बनाने के दो-तीन महीने के बाद बिजली तब गिरती है, जब लड़की को पता चलता है कि वह मां बननेवाली है। मारे शर्म के या तो वह खुदकुशी की कोशिश करती है या फिर गर्भ गिराने की बदनामी झेलती है। इसके साथ ही कलंकित होता है उसका पूरा परिवार। वहीं, लड़की का साथी या तो गायब हो जाता है, या फिर लड़की के परिवार द्वारा किए गए यौन उत्पीडऩ के केस में फंस हवालात की सजा काटता है। ऐसे कम ही खुशनसीब लड़की होती है, जिसे गर्भ ठहरने के बाद ही लड़का कबूल कर लेता है। परंतु यह उम्र शादी की नहीं होती, सो परिवार वाले इसके लिए राजी नहीं होते और अन्तत: लड़की के पास गर्भ गिराने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहता। इसमें कसूर किसका है लड़की या लड़का या फिर अभिभावक, जिन्होंने बच्चों को इतनी आजादी दे रखी थी? बच्चियां बड़ी होने के साथ मां-बाप की जिम्मेवारी बढ़ जाती है। सौ में साठ फीसदी अभिभावक यह नहीं देखते कि बच्ची यदि कॉलेज गई है तो उसने कितने क्लास किए। उसके मित्रों की सूची में कौन-कौन लड़के हैं। कॉलेज कैसे जाती है, आने में विलंब क्यों हुआ, जिस विषय का वह कोचिंग करना चाहती है, क्या वास्तव में उसे जरूरत है या फिर टाइम पास? ऐसी छोटी-छोटी चीजों पर नजर रखकर बच्चों को दिग्भ्रमित होने से बचाया जा सकता है। बेटों के पिता की जिम्मेवारी भी बेटी के पिता से कम नहीं है? यदि उनका बेटा किस लड़की के साथ गलत हरकत करता है। ऐसे में बदनामी उनकी भी होती है, समाज में उनका सिर भी झुकता है। ऐसे में थोड़ी से चौकसी इस भीषण समस्या से बचा सकती है। अत: चेतिए और बच्चों को दोस्त बनाइए ताकि ये आपको अपने दिल की बात बेहिचक बता सकें। इससे आप गंभीर संकट में फंसने से बच जाएंगे। बिहार के छोटे-छोटे गांव से भी नाबालिग लड़के-लड़कियां शादी की नीयत से भागने लगे हैं। वहीं, अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि गर्भ गिरानेवालों की संख्या भी बढ़ी है।

आंख और आंसू

आदमी दुखी होने पर भी रोता है, संवेदनशील हो और खुशी जाहिर करनी हो, तब भी उसकी आंखें सजल हो उठती हैं। आंख और आंसू भीतरी व्यक्तित्व को व्यक्त करते हैं। इसीलिए पहुंचे हुए महात्मा की आंख में आंख डालने का मौका मिले तो तप के क्या परिणाम होते हैं, यह जानने की कोशिश की जाए। जैसे नवजात शिशु की आंख निर्दोष होती है, वैसे ही संत की आंखों में परमात्मा की गहराई होती है और आंसू होते तो आंख का हिस्स हैं, पर धोते हृदय को हैं।


विभीषण से बात करते हुए सुंदरकांड में हनुमानजी द्रवित हो गए। उन्होंने श्रीराम के कृपालु चरित्र का वर्णन किया और तुलसीदासजी ने लिखा - अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।। (सुंदरकांड दोहा-७) हे सखा! सुनिए, मैं ऐसा अधम हूं, पर श्रीराम ने तो मुझ पर भी कृपा ही की है। भगवान के गुणों का स्मरण करके हनुमानजी के नेत्रों में जल भर आया।


लेकिन भगवान को याद करके जब आंसू निकलते हैं तो वह अमृत होते हैं और दुनिया की याद में जो बहाए जाते हैं, वो जहर होते हैं। आंख के आंसू भक्ति में जरूर बहना चाहिए, क्योंकि जिनकी आंख के आंसू सूख गए, उनके लिए भक्ति कठिन होगी।


आंसू हृदय को न सिर्फ धोते हैं, बल्कि उन बातों से ओतप्रोत रखते हैं, जो उन्हें परमात्मा तक ले जाती हैं, जो हमें प्रेमपूर्ण बनाती हैं। इसलिए अकारण आंसू न रोकें, लेकिन इतना आश्वासन जरूर अपनी आंखों को दें कि आंसू भगवान से जुड़ने के लिए सेतु का काम करेंगे, प्रेम का भाव प्रदर्शित करने की इबारत बनेंगे।

आइए, लें एक शपथ कि धरती को बचाएंगे

आइए, लें एक शपथ कि धरती को बचाएंगे

जन्म देने वाली मां यदि बीमार पड़ जाती हैं, तो हमारी नींद उड़ जाती है। हम उसे ठीक करने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, जबकि इस मां ने दो-चार ही पुत्र-पुत्रियां जने हैं। वहीं, दूसरी 'मां' जिसे दुनिया धरती माता के नाम से जानती है, पुकारती है, इसके तो कई करोड़ 'बेटे' हैं। यह हमें खाना देती है, रहने के लिए जगह देती है। यूं कहें कि दुनिया में जितनी चीजें दिखती हैं, सबकुछ इसी 'मां' की देन है। इसके बावजूद आज हम इस 'मां' के दुश्मन बन गए हैं। हरे-भरे वृक्ष काट रहे हैं। इसके गर्भ में रोज खतरनाक परीक्षण कर रहे हैं। इतना जल बर्बाद किया कि कई हिस्से जलविहीन हो गए हैं। लाख कोशिशों के बाद भी दुनिया भर के वैज्ञानिक 'दूसरी पृथ्वी' को नहीं ढूंढ सकें। 1970 के 22 अप्रैल को पहली बार पृथ्वी दिवस मनाया गया। तत्पश्चात यह सिलसिला साल-दर-साल जारी है। क्या आपने सोचा है कि मौसम में बदलाव क्यों हो रहा है? गर्मियां और गर्म क्यों हो रही हैं? सर्दियां सिमटकर माह भर क्यों रह गई हैं? बेमौसम बारिश, बेमौसम जलसंकट, घटते जीव-जंतु व पक्षी कहीं न कहीं चीख-चीखकर इस बात के संकेत दे रहे हैं कि धरती माता के बचाव के लिए सबको आगे आना चाहिए। वरना हमारे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। ग्लोबल वार्मिंग यानी जलवायु परिवर्तन आज पृथ्वी के लिए बड़ा संकट बन गया है। पृथ्वी के संबंध में कई तरह की भविष्यवाणियां भी की जा चुकी हैं। मसलन-दुनिया अब नष्ट हो जाएगी, पृथ्वी जलमग्न हो जाएगा वगैरह-वगैरह। विकास की होड़ में विश्व के 70 फीसदी विकसित देशों ने पृथ्वी को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है, पहुंचा रहे हैं। इसका खामियाजा पूरी दुनिया को उठाना होगा। बता दें कि कई गैसें सूर्य के प्रकाश को धरती पर आने तो देती हैं, लेकिन इसके कुछ भाग को वापस लौटने में बाधक बन जाती है। इसी प्रक्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं। ये गैसें है-कार्बन डाइ-आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड। ये गैसें हमारे वायुमण्डल में उपस्थित ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रही हैं। वायुमण्डल में धीरे-धीरे छिद्र होता जा रहा है, जो सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणों को रोकने में असफल हो रही है। नतीजतन, पृथ्वी का तापमान बढ़ता ही जा रहा है। तीन सौ सालों में वैश्विक तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। आइए, पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल 2011) को हम सब शपथ लें कि अपनी धरती माता को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। मसलन-पौधरोपण को खुद के रूटीन में शामिल करेंगे। इसके लिए औरों को भी प्रेरित करेंगे। पॉलीथिन का इस्तेमाल नहीं करेंगे। कागज का इस्तेमाल कम से कम करेंगे। इससे कई बांस के पेड़ कटने से बच जाएंगे। सूख रहे तालाब, कुएं को फिर से जीवित करेंगे। ब्रश करते वक्त बेसिन का नल धीमे खोलेंगे। सड़े-गले सामान सही जगह पर फेंकेंगे। खाना बनाने के लिए बायो गैस या कुकिंग गैस का ही उपयोग करेंगे। वर्षा का जल संचय की बात को गंभीरता से लेंगे। जरा सोचिए, इस पृथ्वी ने हमें क्या नहीं दिया है। दुनिया में जितनी भौतिक चीजें हैं, सब इसी की तो देन है। इसके बावजूद, हम इसे रोज नुकसान पहुंचा रहे हैं?