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Tuesday, October 4, 2011

खतरे में आरटीआई कार्यकर्ता

खतरे में आरटीआई कार्यकर्ता

सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार को उजागर करने में लगे आरटीआई कार्यकर्ता रामदास घाडेगावकर का शव नांदेड़ में बरामद हुआ है। रामदास की मौत का मामला गुजरात के आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा की हत्या के चंद हफ्तों बाद सामने आया है। जेठवा गिर वन क्षेत्र में अवैध खनन को उजागर करने में लगे हुए थे। इस तरह से सात महीने में आठ से ज्यादा लोग इस अधिकार की बलिबेदी पर चढ़ चुके हैं। इनका कुसूर बस इतना था कि इन लोगों ने सवाल पूछा था। इनके सवालों ने भ्रष्टाचारियों की पोलपट्टी खोल दी थी। भूमि घोटाले का पर्दाफाश भी इन्हीं सवालों के जरिए हुआ था। ये ऐसे सवाल थे, जिनसे भ्रष्टाचारियों की नींद हराम हो गई थी। सच और सूचना के ये सिपाही भ्रष्टाचारियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए थे। नतीजतन, पिछले सात महीनों में आठ आरटीआई कार्यकर्ता अपनी जान गवां चुके हैं। बीती 20 जुलाई को ही अहमदाबाद में आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। सूचना के अधिकार कानून के तहत जेठवा ने गीर के जंगलों में अवैध खनन के मामले का पर्दाफाश किया था। पुलिस उनकी हत्या के पीछे खनन माफिया का हाथ होने की बात कह रही है, लेकिन जेठवा के पिता भीखू भाई अपने बेटे की हत्या के पीछे भाजपा नेता एवं सांसद दीनू भाई सोलंकी का हाथ होने की बात कह रहे हैं। वैसे इस आरोप में दम भी है, क्योंकि जेठवा ने भाजपा सांसद दीनू भाई सोलंकी के खिलाफ भी अवैध खनन की शिकायत की थी और इसी वजह से सोलंकी पर एक बार 40 लाख रुपये का जुर्माना भी लगा था।जेठवा सोलंकी के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके थे। कुछ समय पहले भी अमित जेठवा पर कातिलाना हमला हो चुका था। जेठवा के आरटीआई आवेदनों के कारण अवैध खनन से जुड़े कई मामले सामने आए थे। साथ ही एक सीमेंट कंपनी को भी जेठवा के आवेदनों से काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था। जेठवा के पिता भीखू भाई अपने बेटे की हत्या की जांच सीबीआई से कराना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि मामला भाजपा के सांसद से जुड़ा है, इसलिए राज्य की भाजपा सरकार और उसकी पुलिस निष्पक्ष होकर जांच नहीं कर पाएगी।भीखू भाई की यह आशंका बहुत हद तक सही भी है। सवाल है कि जिस व्यवस्था के खिलाफ कोई नागरिक एक सूचना निकालता है और उसे सार्वजनिक करता है, वही व्यवस्था क्यों और कितनी सुरक्षा उस नागरिक को देना चाहेगी। निष्पक्ष जांच की बात तो बहुत दूर की है। यह सच्चाई कौन नहीं जानता कि किसी भी बड़े घोटाले में कौन-कौन से और किस तरह के लोग शामिल होते हैं। भारत में जितने भी बड़े घोटाले सामने आए हैं, उनमें किसी नेता या अफसर की संलिप्तता जरूर होती है। ऐसे में अगर कोई आम आदमी किसी घोटाले का पर्दाफाश करता है तो सोचिए क्या होगा।पुणे के सतीश शेट्टी के साथ क्या हुआ? भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सतीश शेट्टी की भी हत्या कर दी गई। सुबह-सुबह जब वह घर से बाहर निकले तो उन पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया गया। 38 वर्षीय सतीश पुणे से 40 किलोमीटर दूर तालेगांव में रहते थे। सूचना के अधिकार के तहत सतीश कई मामलों का पर्दाफाश कर चुके थे। सतीश पुणे की भ्रष्टाचार उन्मूलन समिति के संयोजक भी थे। आरटीआई का इस्तेमाल कर सतीश शेट्टी ने महाराष्ट्र में कई जमीन घोटालों और मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे में घोटाले को उजागर किया था।इसी वजह से सतीश भू-माफियाओं के निशाने पर आ गए थे। आरटीआई की सहायता से सतीश ने अवैध बंगले के निर्माण और मिट्टी के तेल एवं राशन की कालाबाजारी के विरोध में भी आवाज उठाई थी। मई, 2010 में महाराष्ट्र के ही दत्ता पाटिल, जो अन्ना हजारे के करीबी सहयोगी भी थे, की हत्या कर दी गई। पाटिल आरटीआई के जरिए भ्रष्टाचार के कई मामले सामने लाए थे, जिसकी वजह से एक पुलिस उपाधीक्षक और एक वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर को नौकरी से हटा दिया गया था। नगर निगम के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू हो गई थी। पाटिल ने एक बिल्डर के खिलाफ भी कई मामले पुलिस में दर्ज कराए थे।सच और ईमानदारी से काम करने वाले पाटिल को इन सबकी कीमत अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी। अप्रैल, 2010 में महाराष्ट्र के वि_ल गीते की हत्या भी इसलिए कर दी गई, क्योंकि उन्होंने आरटीआई के इस्तेमाल से गांव के एक स्कूल में चल रही धांधली का पर्दाफाश किया। बाद में एजूकेशनल सोसायटी चलाने वाले एक दबंग आदमी के बेटे ने गीते पर हमला कर दिया। इन सारी घटनाओं में जो समानता दिखती है, वह यह है कि सभी मामलों के आरोपी ताकतवर लोग हैं।अप्रैल, 2010 में ही आंध्र प्रदेश के सोला रंगाराव को सवाल पूछने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। राव ने अपने गांव में नाला निर्माण के लिए जारी किए गए फंड के बारे में सवाल पूछे थे। राव के परिवारवालों का आरोप है कि राव की हत्या में वही लोग शामिल हैं, जिन्होंने नाला निर्माण के फंड से पैसे चुराए हैं। फरवरी, 2010 में बिहार के बेगूसराय निवासी शशिधर मिश्रा की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें लोग खबरी लाल के नाम से जानते थे, क्योंकि उन्होंने कई घोटालों का भंडाफोड़ किया था। जाहिर है, कुछ लोगों को यह सब पसंद नहीं आया होगा। नतीजा यह निकला कि शशिधर मिश्रा के सिर में गोली मार दी गई। यानी सच का एक और सिपाही मारा गया।हिंसा की उक्त सभी घटनाएं इसी साल की हैं, लेकिन दो साल पहले भी झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता ललित मेहता की हत्या इसीलिए हुई थी कि उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का सोशल ऑडिट कराने का प्रयास किया था। वह इस योजना के तहत किए गए खर्च को आधिकारिक तौर और धरातल पर जांचना चाहते थे, लेकिन सोशल ऑडिट से एक दिन पहले ही उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। इंजीनियर से सामाजिक कार्यकर्ता बने ललित मेहता की किसी से दुश्मनी नहीं थी।वह तो पलामू जिले में भोजन के अधिकार अभियान के प्रमुख सदस्य थे। पुलिस ने उनके शव का जल्दबाजी में पोस्टमार्टम कराया और घटनास्थल से 25 किलोमीटर दूर ले जाकर दफना दिया। ललित मेहता की हत्या के 12 दिनों बाद सोशल ऑडिट हुआ। ऑडिट से पता चला कि जिले में योजना के तहत खर्च किए गए 73 करोड़ रुपये का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदारों, अधिकारियों और विकास माफियाओं की जेब में चला गया।

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