Happy Dipawali

Happy Dipawali
Be happy

Tuesday, October 4, 2011

हिंसक कौन? मनुष्य या फिर बाघ?

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के पास जिस बर्बरता से एक बाघिन को पीट-पीटकर मार डाला गया, वह घटना न सिर्फ दिल दहला देने वाली है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे बाघ संरक्षण के तमाम सरकारी एवं गैरसरकारी प्रयासों को एक गंभीर झटका भी है।

यह घटना इस बात को भी रेखांकित करती है कि मनुष्य कितना निर्दयी होता जा रहा है और बाघ कितना बेबस, बेसहारा और अकेला। जिस तरीके से करीब दस हजार लोगों ने कुल्हाड़ी, दराते, पत्थर और डंडों से उस निरीह, थकी हुई बाघिन पर आक्रमण किया, वह कृत्य अमानवीय से भी अधिक घृणित कहा जाएगा।

देश भर के वन्यप्राणी संरक्षक तथा बाघप्रेमी इस घटना से अवाक हैं, दुखी हैं। इस घटना से उपजे नए प्रश्नों के जवाब तमाम सरकारों और बाघप्रेमियों को तलाशने होंगे। छत्तीसगढ़ शासन की जांच में कई नई बातें सामने आएंगी।

बखरूटोला छोटा-सा गांव है, जो छुरिया नगर पंचायत के अंतर्गत आता है। यह आदिवासी-पिछड़ा क्षेत्र है, जहां धान की खेती होती है। कुछ ही किलोमीटर पर महाराष्ट्र का गोंदिया जिला है। राजनांदगांव से सटे हुए महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित चंद्रपुर और गढ़चिरोली जिले जंगलों से भरपूर हैं।

यही सारा इलाका बाघों का अपने हक का असली बसेरा है। किंतु छुरिया या बखरूटोला जैसे छोटे गांवों में बाघ का आना-जाना नहीं था। ऐसा बताया जाता है कि यहां के लोगों ने पहली दहाड़ 9 जुलाई को सुनी थी। उसके बाद 15 सितंबर को मुड़मारी (महाराष्ट्र) गांव में एक वृद्ध महिला को इस बाघिन ने हमला कर मार गिराया।

इसके बाद कुछ मवेशियों पर भी उसने हमला किया था। इसी कारण क्रुद्ध लोगों ने बाघिन को घेरा और खदेड़ा। जब वह थककर दलदल में फंस गई, तब उस पर अत्यंत क्रूरतापूर्वक हमला बोल दिया.. उसकी पूंछ काट दी, दांत तोड़ दिए एवं आंखें फोड़ दीं।

छत्तीसगढ़ वन विभाग के अधिकारियों एवं पुलिस की मौजूदगी में यह हादसा हुआ। वे देखते रह गए। शिकार पर पाबंदी से पूर्व के दिनों में शिकारियों द्वारा मारे गए बाघों से कहीं अधिक निर्दयता से इस हत्या को अंजाम दिया गया। वह बाघिन नरभक्षी नहीं थी, यह जान लेना भी जरूरी है।

बखरूटोला सिर्फ 2,000 की जनसंख्या का गांव है। इस गांव में 10,000 लोगों की भीड़ इकट्ठा होना और राष्ट्रीय पशु को निर्ममता से मार डालना निश्चित ही हर समझदार व संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाली घटना है।

बाघिन को मारने के लिए पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में लोग छत्तीसगढ़ में घुस आए थे। गांव वालों के मन में जो गुस्सा खदबदा रहा था, उसे ठंडा करने के सामयिक उपाय छत्तीसगढ़ वन विभाग ने क्यों नहीं किए?

देश में 1973 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत की गई थी। सोच थी कि बाघों की घटती संख्या को थामा जाए और जंगल के इस नायाब प्राणी की रखवाली के पुख्ता इंतजाम किए जाएं। लेकिन बाघों के लगातार सफाए के साथ ही ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की नाकामी जगजाहिर हो गई।

फिर 2005-2006 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण बनाया गया, जिसके लिए करोड़ों रुपयों का बजट भी दिया गया। राज्यों में भी बाघ संरक्षण के प्रति जागरुकता बढ़ी। पर्यटन के प्रति बढ़ती रुचि और विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों जैसे कान्हा, बांधवगढ़, सुंदरवन, ताडोबा, रणथम्भौर में पर्यटकों की बढ़ती संख्या बताती है कि बाघों के प्रति जनमानस में आकर्षण एवं लगाव बढ़ा है।

इस सुंदर प्राणी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्र की धरोहर कहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह माना जा रहा है कि यदि बाघ बचेगा तो सिर्फ भारत में ही। मध्यप्रदेश के पन्ना में वर्ष 2004-05 के बाद बाघ गायब हो गए। यह बड़ी त्रासदी थी, ठीक सरिस्का जैसी।

किंतु मध्य प्रदेश ने वह कमाल कर दिखाया, जिसने असंभव को संभव में बदल दिया। अब पन्ना में बाघ हैं और बढ़ भी रहे हैं। लगातार निगरानी, संरक्षण के नित नए उपाय, जनता और राजनेताओं में बढ़ती समझ के कारण बाघों की संख्या अब 1411 से बढ़कर करीब 1700 तक पहुंच गई है।

सरिस्का घटित होने के बाद प्रधानमंत्री ने सुनीता नारायण की अध्यक्षता में टाइगर टास्क फोर्स गठित की, जिसने कई व्यावहारिक सुझाव दिए। कुछ पर अमल हुआ, कुछ पर विवाद हुए और कुछ वैसे ही कागज पर रह गए।

टास्क फोर्स एवं अन्य विषय विशेषज्ञों ने बाघ और मनुष्य के टकराव को खत्म करने की बात की थी। वह कैसे हो, इस पर बाघ विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं। बाघ-मनुष्य एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु कैसे हो सकते हैं, इस पर भी बातें हुई थीं।

नई नीतियां बनीं, नए नियम बने। बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने आर्थिक पैकेज बनाया, जिससे बाघ क्षेत्र से हटाए जाने वाले परिवारों को कुछ लाख रुपए तक अब दिए जा रहे हैं। बाघ द्वारा मवेशी खाने पर, आदमी को जख्मी करने अथवा मार डालने पर भी काफी रकम दी जा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ के वन विभाग के अफसरों का यह कहना कि भीड़ इतनी नाराज थी कि बाघिन को बचाया नहीं जा सका, दुखद है।

व्यवस्थित योजनाबद्ध तरीके से उसे बेहोश (ट्रैंक्विलाइज) किया जा सकता था। वह बाघिन करीब 45 दिनों से उस क्षेत्र में घूम रही थी। उसने मवेशियों पर हमला किया था अर्थात उसके भोजन के पूरे इंतजाम उस क्षेत्र में नहीं थे। उसके कुछ दिन पूर्व बीमारी के चलते उसे चंद्रपुर में पिंजरे में रखा गया था।

आम तौर पर बाघ मानव बस्ती से दूर ही रहता है। स्वभाव से बाघ शांतिप्रिय है और भोजन मिलता रहे तो मनुष्य की तरफ नजर उठाकर वह देखता तक नहीं है। बाघ अभयारण्यों के बाहर भी सुरक्षित रहें, वहां बफर जोन बनें, बाघों के विचरण हेतु लंबे कॉरिडोर की सुरक्षा हो, ग्रामीणों को वृहत स्तर पर शिक्षित किया जाए कि बाघ मनुष्य का दुश्मन नहीं है, यह सब बहुत आवश्यक है, जिससे ऐसी दुर्घटनाएं न हों।

त्रासदी यह है कि मनुष्य समझदार, शिक्षित होकर भी जनसंख्या पर संयम नहीं रख रहा है और बाघों के बसेरों को उजाड़ता जा रहा है। बाघ लगातार अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। राजनांदगांव की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर दोहराया है कि मनुष्य स्वार्थी और असंवेदनशील होता जा रहा है। दुर्गा पूजा के ठीक पहले मां दुर्गा का वाहन भारत जैसे संस्कारवान देश में मार दिया गया था। इसे क्या कहें?

No comments:

Post a Comment