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Tuesday, October 11, 2011

गजल सम्राट जगजीत सिंह

गजल सम्राट जगजीत सिंह का आज चंदनवाड़ी में अंतिम संस्‍कार कर दिया गया। ब्रेन हैमरेज के चलते करीब 15 दिन अस्‍तपाल में रहने के बाद सोमवार (10 अक्‍टूबर) को उनका निधन हो गया था। लेकिन बताया जाता है कि यह उनके निधन का तात्‍कालिक कारण था। असल में उनका निधन उस दर्द के चलते हुआ, जो उन्‍हें जवान बेटे की मौत के बाद मिला था।
मशहूर गायिका आशा भोंसले के मुताबिक जगजीत कभी भी लोगों के साथ अपना दुख नहीं बांटते थे और न ही लोगों के सामने उसे जाहिर होने देते थे। वह याद करती हैं कि जब उनके बेटे के निधन के बाद उन्‍हें सांत्‍वना देने गई थीं, तब उन्‍होंने कहा था कि इस बारे (बेटे की मौत) में बात नहीं करें। बकौल आशा, वह सारा गम अपने सीने में दबा कर रखते थे और शायद इसका उनकी सेहत पर बहुत बुरा असर पड़ा।

1990 में जगजीत और चित्रा के बेटे विवेक की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उसके बाद जगजीत को जुबां पर गीत लाने में छह महीने लग गए थे और चित्रा की आवाज तो खामोश ही हो गई थी। चित्रा दो साल पहले अपनी बेटी को भी खो चुकी हैं। उनकी पहली शादी से जन्‍मी मोनिका ने बांद्रा के अपने फ्लैट में खुदकुशी कर ली थी।

जगजीत शुरू से ही अंतरमुखी स्‍वभाव के थे। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि किशोरावस्था में वे एक लड़की पर फिदा हो गए थे। जालंधर में पढ़ाई के दौरान साइकिल पर ही आना-जाना होता था। लड़की के घर के सामने साइकिल की चेन टूटने या हवा निकलने का बहाना कर बैठ जाते और उसे देखा करते थे। बहरहाल, उनका यह प्यार परवान नहीं चढ़ सका था।

जगजीत सिंह के बारे में बहुत ही कम लोगों को पता है कि कपड़े प्रेस करना उनकी हॉबी थी। उन्हें घुड़दौड़ का भी बहुत शौक था, उन्होंने घोड़े पाले भी थे। बचपन में फिल्मों के शौक के चलते अक्सर सिनेमाहॉल में गेटकीपर को घूस देकर घुसते थे।

चैरिटी के अनेक कार्यों में वे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते थे। कई समाजसेवी संस्थाओं के सहायतार्थ गाया। ‘क्राई फॉर क्राई’ एलबम भी निकाला। मेहदी हसन के इलाज के लिए उन्होंने पाकिस्तान जाकर तीन लाख रुपए की मदद की थी। अपने संघर्ष के दिनों को याद कर नए कलाकारों की मदद के लिए तैयार रहते थे।  


कहां तुम चले गए... 

जन्म 8 फरवरी, 1941 को श्रीगंगानगर (राजस्थान) में। जन्म के समय पिता ने नाम दिया जगमोहन, पर अपने गुरु की सलाह पर बाद में कर दिया जगजीत।

पीडब्ल्यूडी में कार्यरत, पिता अमर सिंह पंजाब में दल्ला गांव के मूल निवासी थे और मां थीं बचन कौर। आर्थिक हालात ये थे कि बकौल जगजीत, ‘पतंग और रेडियो भी लक्जरी हुआ करते थे।’ शुरुआती साल बीकानेर में बीते, फिर श्रीगंगानगर लौटे।

पिता ने पं. छन्नूलाल शर्मा से संगीत की शिक्षा लेने भेजा। फिर छह साल उस्ताद जमाल खान से भी तालीम ली। कॉलेज के दिनों में एक रात चार हजार की भीड़ के सामने गा रहे थे कि बिजली चली गई। साउंड सिस्टम बैटरी के जरिए चालू रहा। जगजीत गाते रहे और क्या मजाल कि अंधेरे के बावजूद कोई उठकर गया हो!

स्नातक शिक्षा के लिए वे डीएवी जालंधर पहुंचे। यहां आकाशवाणी ने उन्हें ‘बी’ वर्ग के कलाकार की मान्यता दी। 1962 में जालंधर में ही उन्होंने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के लिए स्वागत गीत रचा।

1961 में वे मुंबई पहुंचे। संघर्ष में पैसे खत्म हो गए थे। इसी हालत में ट्रेन के शौचालय में छुपकर बिना टिकट जालंधर गए।

मार्च 1965 में वे दुबारा मुंबई लौटे। सस्ती जगह पर रहते थे। खटमलों के साथ सोते थे। एक रात तो चूहे ने पैर काट खाया।

छोटी-मोटी महफिलों, घरेलू आयोजनों, फिल्मी पार्टियों, विज्ञापन जिंगल्स आदि में गाते थे। इसी बीच एचएमवी ने एक रिकॉर्ड के लिए उनसे दो गजलें गवाईं। इसी के कवर पर छपने वाले चित्र के लिए उन्होंने पहली बार दाढ़ी और पगड़ी हटाई।

एक जिंगल की रिकॉर्डिंग के दौरान अपनी भावी जीवन संगिनी चित्रा दत्ता से मिले। 19६९ में बिना धूम-धड़ाके, रिसेप्शन या उपहार के उनकी शादी हो गई। शादी पर खर्च हुए कुल जमा 30 रुपए।

एक कमरे के मकान में रहते थे। 1971 में पुत्र विवेक का जन्म। आर्थिक मजबूरियां ऐसी कि चित्रा ने 20 दिन के बच्चे को गोद में लेकर माइक पर जिंगल गाया। बावजूद इसके जगजीत महसूस करते थे कि तब वे ‘दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति’ थे।

1975 में एचएमवी से पहला एलपी ‘द अनफॉरगेटबल्स’ आया। इसकी रिकॉर्ड कामयाबी के बाद उन्होंने मुंबई में फ्लैट खरीदा।

1980 में फिल्म ‘साथ-साथ’ और ‘अर्थ’ में स्वर और संगीत दिया। 1987 में उनका ‘बियॉन्ड टाइम’ देश का पहला संपूर्ण डिजिटल सीडी एलबम बना। अगले साल टीवी सीरियल ‘मिर्जा गालिब’ में स्वर और संगीत दिया।

28 जुलाई, 1990 को एकमात्र पुत्र विवेक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद आध्यात्मिकता और दर्शन की ओर झुकाव बढ़ा। पहला एलबम आया ‘मन जीते जगजीत’ (गुरबानी)।

संगीत के प्रति ऐसी प्रतिबद्धता कि 2001 में मां के अंतिम संस्कार के बाद उसी दोपहर कोलकाता में पूर्व निर्धारित कॉन्सर्ट के लिए पहुंचे।

2003 में पद्मभूषण सम्मान मिला।

नई दिशा (1999) व संवेदना (2002) के लिए प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी के गीतों को सुर और संगीत दिया।


10 मई, 2007 को संसद के केंद्रीय कक्ष में प्रस्तुति दी।


लोकप्रिय एलबम 
इकोज, द अनफॉरगेटबल्स, माइलस्टोन, कम अलाइव, द लेटेस्ट, बियॉन्ड टाइम, साउंड अफेयर, कहकशां, मिर्जा गालिब (सभी चित्रा सिंह के साथ) फेस टू फेस, लाइव विद जगजीत सिंह, मरासिम, मिराज, इनसाइट, क्राई फॉर क्राई, मां, सांवरा, हे राम।
यादगार गजलें 
सरकती जाए है रुख से नकाब.., ये दौलत भी ले लो.., किया है प्यार जिसे.., मेरी जिंदगी किसी और की.., कोई चौदहवीं रात का चांद बनकर.., चराग आफताब गुम.., झूम के जब रिंदों ने पिला दी.., पहले तो अपने दिल की रजा जान जाइए.., मैं नशे में हूं.., अपने होंठों पर सजाना चाहता हूं.., जब किसी से कोई गिला रखना.., सच्ची बात कही थी मैंने.., कोई पास आया सवेरे-सवेरे...।
लोकप्रिय गीत 
होंठों से छू लो तुम...(प्रेमगीत), झुकी झुकी सी नजर..(फिल्म अर्थ) तुमको देखा तो...(साथ-साथ), तुम इतना जो मुस्करा रहे हो...(अर्थ), फिर आज मुझे तुमको...(आज), हमसफर बनके हम...(आशियां), चिट्ठी न कोई संदेश...(दुश्मन), होशवालों को खबर क्या...(सरफरोश)।
 

Friday, October 7, 2011

काश! बेटियों के लिए भी सजे बंदनवार

एक जर्नल के पन्ने पलटते हुए नजर छोटे-से विज्ञापन पर गई। विज्ञापन के सबसे निचले हिस्से पर लिखा हुआ था - ‘कपूर एंड डॉटर्स’। अब तक शर्मा एंड संस, गुप्ता एंड संस, ठाकुर एंड संस जैसे फर्मो के नाम देखने की ही आदत रही है। इसलिए यह छोटा-सा बदलाव सुखद भी था और प्रतीकात्मक भी।


बदलाव बाबा आदम के जमाने से चले आ रहे हैं। इतिहास कई बड़े बदलावों का साक्षी रहा है। लेकिन बदलाव वे ही नजर आते हैं, जो भौतिक रूप से घटित होते हैं। जैसे 64 साल पहले लाल किले पर तिरंगे का लहराना। बड़ा राजनीतिक बदलाव। साफ नजर आया। हाल के वर्षो में कार्यस्थलों पर महिलाओं की संख्या का बढ़ना। महिलाएं कार्यस्थलों पर दिख रही हैं। इसलिए माना जा सकता है कि बदलाव हुआ है, एक बड़ा सामाजिक बदलाव। लेकिन दिमाग के भीतर बदलाव न तो इतनी आसानी से होता है और न ही साफ नजर आता है। क्या बेटियों या महिलाओं के प्रति जो नजरिया है, वह बदला है? केवल पुरुषों के दिमाग मंे ही नहीं, महिलाओं के दिमाग में भी। इसलिए किसी फर्म के साथ अगर ‘डॉटर्स’ शब्द जुड़ता है तो यह भौतिक बदलाव के साथ-साथ शायद मानसिकता में बदलाव का भी संकेत है। हालांकि यह पर्याप्त नहीं है।



पिछले दिनों मध्यप्रदेश के चंबल क्षेत्र के कुछ गांवों के भ्रमण का मौका मिला। यह क्षेत्र लड़कियों के साथ भेदभाव के लिए बदनाम रहा है। आंकड़े अक्सर इसकी पुष्टि करते हैं। लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कम हो रही है। कन्या पैदा ही नहीं हो, इसके लिए कई तरह के जतन किए जाते हैं। छोटी-छोटी कन्याओं को किस तरह से मारा जाता है, इसे लेकर क्षेत्र में कई कहानियां प्रचलित हैं। लड़के के पैदा होने पर जश्न-सा माहौल होता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि बेटा पैदा होने पर ‘चरुआ’ मनाया जाता है। इसमें चौदह दिनों तक लड़के की मां को पोषण तत्वों से युक्त पदार्थ खिलाए जाते हैं। लेकिन लड़की होने पर लगता है मानो परिवार मंे गमी हो गई हो।


बच्ची की मां भी ‘आत्मग्लानि’ में तीसरे-चौथे दिन से काम में जुट जाती है। इसके पीछे निश्चित तौर पर ऐतिहासिक कारण रहे होंगे, लेकिन लगता है वे सामाजिक परिस्थितियों के साथ रच-बस गए हैं। यही परिस्थितियां बेटों के प्रति ललक को न्यायसंगत ठहराती हंै और यह सिलसिला लगातार चलता जाता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं, परिस्थितियां और उनके तर्क अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन घर में पैदा होने वाली बेटी को ‘लक्ष्मी’ कहने के बावजूद अधिकांश लोगों में यह मलाल अक्सर रहता है कि काश, लड़का होता!


कुछ चीजें शायद कभी नहीं बदलेंगी। जैसे विदाई हमेशा लड़की की होगी, लड़के की नहीं। सुरक्षा से जुड़ी दिक्कतें भी प्राय: लड़कियों के साथ ही रहेंगी। शायद दहेज जैसी सामाजिक बुराइयां भी आने वाले सालों में लड़कियों के माता-पिता के लिए समस्या बनी रहेंगी। लेकिन फिर भी बहुत कुछ बदला जा सकता है। अगर महिलाओं के प्रति सामाजिक बोध बदला जा सके, तो कन्या पूजन के लिए नवरात्रि के नौ दिनों का इंतजार करने की जरूरत नहीं रहेगी। हिंदी बेल्ट के एक मुख्यमंत्री बेटी बचाओ अभियान शुरू कर रहे हैं।

अच्छी बात है, लेकिन सच तो यह है कि सामाजिक समस्याओं के समाधान सरकारी अभियानों में नहीं होते। स्वयं समाज ही इसका समाधान हो सकता है। आज की बेटी, जो कल मां भी होगी और सास भी, के जिम्मे भी आने वाली बेटियों का सम्मान और अस्मिता रहेगी।

और चलते-चलते.. मेरे मित्र की एक बेटी है। उससे वे बहुत प्यार करते हैं। वे अक्सर कहते हैं, मेरे लिए तो यह बेटे जैसी है। क्या हमारा कोई मित्र कभी अपने बेटे के लिए यह कह सकेगा, यह तो मेरी बेटी जैसा है!

http://www.bhaskar.com/article

Tuesday, October 4, 2011

चुकंदर सबसे फायदेमंद



चुकंदर सबसे फायदेमंद सब्जियों में से एक है। नियमित रूप से सलाद या जूस के रूप में इसे लेने के अनेक फायदे हैं। एनिमिया के रोगियों के लिए यह विशेष लाभकारी है क्योंकि इसमें अच्छी मात्रा में लौह, विटामिन और खनिज होते हैं जो रक्तवर्धन और शोधन के काम में सहायक होते हैं। इसमें पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट तत्व शरीर को रोगों से लडऩे की क्षमता प्रदान करते हैं। यह प्राकृतिक शर्करा का स्त्रोत होता है। इसमें सोडियम, पोटेशियम, फॉस्फोरस, क्लोरीन, आयोडीन, और अन्य महत्वपूर्ण विटामिन पाए जाते हैं। चुकंदर में गुर्दे और पित्ताशय को साफ करने के प्राकृतिक गुण हैं।

चुकंदर का रस रक्त वाहिनियों को फैला देता है और इससे शारीरिक सक्रियता के दौरान मांसपेशियों की ऑक्सीजन की आवश्यकता कम हो जाती है। लोगों की उम्र बढऩे या उनमें ह्वदय परिसंचरण तंत्र को प्रभावित करने वाली स्थितियां निर्मित होने पर उनमें व्यायाम के दौरान अंदर ली जाने वाली ऑक्सीजन की मात्रा में नाटकीय रूप से कमी आ जाती है। अगर उम्र बढऩे के साथ आपकी सक्रियता में कमी आ रही है तो आपकी इस समस्या का इलाज है रोज एक ग्लास चुकंदर का जूस।जूस बढ़ती उम्र के लोगों की सिकुड़ती हुई धमनियों को फैलाए रखने में मदद करता है।चुकंदर के जूस में पाया जाने वाला नाइट्रेट ब्लडप्रेशर को कम करता है। हाइब्लडप्रेशर के मरीजों के लिए चुकंदर वरदान है।

चुकंदर का जूस मानव शरीर में खून बनाने की प्रक्रिया में उपयोगी होता है। आयरन की प्रचुरता के कारण यह लाल रक्त कोशिकाओं को सक्रिय और उनकी पुर्नरचना करता है। यह एनीमिया के उपचार में विशेष रूप से उपयोगी होता है। इसके सेवन से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। गैसट्रीक अल्सर के उपचार के दौरान सुबह नाश्ते से पहले एक गिलास चुकंदर के जूस में एक चम्मच शहद को मिलाकर चुकंदर के नियमित सेवन से कब्ज से बचा जा सकता है। यह बवासीर के रोगियों के लिए भी काफी फायदेमंद होता है। रात में सोने से पहले एक गिलास या आधा गिलास जूस दवा के तौर पर पीना फायदेमंद होता है। किडनी और पित्ताशय विकार में चुकंदर के रस में गाजर और खीरे के जूस को मिलाकर पीना उपयोगी होता है। सफेद चुकंदर को पानी में उबाल कर छान लें। यह पानी फोड़े, जलन और मुहांसों के लिए काफी उपयोगी होता है। खसरा और बुखार में भी त्वचा को सा करने में इसका उपयोग किया जा सकता है।

मंदी के नाम पर और कितना शोषण?

मंदी के नाम पर और कितना शोषण?

विश्व के अर्थशास्त्रियों का मानना है कि मंदी के बादल लगभग छंट चुके हैं। भारत के वित्त मंत्री भी घोषणा कर चुके हैं कि फिर से रोजगार के नए अवसर खुलने लगे हैं। परंतु भारत के मध्यम निजी कंपनियों और कुछ उच्च कंपनियों में अभी मंदी का दौर खत्म नहीं हुआ है? मंदी के बहाने अबतक सैकड़ों कंपनियां हजारों लोगों को बाहर का रास्ता दिखा चुकी है। उनलोगों पर गाज अधिक गिरी, जिनके वेतन अधिक थे। कम वेतन वाले तो कुछ सुरक्षित बच गए परंतु अधिक वेतन वाले बेकाम हो गए। मंदी के बहाने फायदे में चली रही कंपनियों ने भी छंटनी के नाम पर कर्मचारियों का जमकर दोहन किया। काम के घंटे बढ़ा दिए जबकि तनख्वाह में फूटी कौड़ी भी बढ़ोतरी नहीं की। गोपनीय आंकड़ों पर गौर किया जाए तो सैकड़ों कंपनियों ने दो वर्षों से मंदी के नाम पर अपने किसी कर्मचारी को 'इन्क्रीमेंट' तक नहीं दिया है। यदि किसी कर्मचारी ने हिम्मत करके अपनी बात रखने की कोशिश की तो नौकरी से निकाल देने की धमकी मिलती है। ऐसे में ये कर्मचारी किससे शिकायत करें, कहां जाएं, अंधी सरकार तो पहले से ही कंबल ओढ़कर सोई हुई है? महंगाई पहले से घरों में समा चुकी है। भारत की एक बड़ी कंपनी की शाखा बिहार में भी है। यहां के कई ऐसे कर्मचारियों से जबरन इस्तीफा ले लिया गया, जो बीस साल से अधिक समय से उस कंपनी में बने हुए थे। इनका कार्य भी बेहतर माना जाता रहा है। इनके बॉस ने कहा कि या तो इस्तीफा दें, वर्ना कोई इल्जाम लगाकर निकाल दिया जाएगा। मजबूर होकर कर्मचारियों को इस्तीफा देना पड़ा। एक दशक पहले तक बड़ी कंपनियों में नौकरी 'पर्मानेंट' होती थी। किसी कर्मचारी को हटाना आसान भी नहीं था। अब सभी कंपनियों में नौकरी 'कांट्रेक्ट' पर दी जा रही है, जिसे कंपनी जब चाहे हटा दे रही है। इसका कहीं विरोध नहीं हो रहा क्योंकि सरकार ही पक्ष में खड़ी है। इधर, हजारों कर्मचारी डर के साये में नौकरी कर रहे हैं। मंदी की दस्तक के साथ ही कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को न सिर्फ डराया बल्कि जमकर शोषण भी किया और कर रहे हैं। आसमान छूती महंगाई ने कम वेतन पाने वालों के घर से दाल की कटोरी गायब कर दी है। गृहणियां अपने पतियों से उलझ रही हैं कि खर्च कैसे चलाएं? इसका जवाब निजी कंपनी के कर्मचारियों के पास नहीं है। हालांकि कर्मचारियों के मस्तिष्क में एक बात अवश्य तैर रही है कि मंदी के नाम पर उनका और कितना शोषण किया जाएगा? कांट्रेक्ट पर बहाली करते वक्त ही कंपनियां कर्मचारियों से लिखता लेती है कि यदि उनका कार्य ठीक-ठाक नहीं रहा तो उन्हें 'कांट्रेक्ट' की अवधि के पूर्व भी हटाया जा सकता है। ऐसे में खामोश रहना इनकी मजबूरी है, लेकिन कब तक?

बच्चों को इतनी आजादी?

बच्चों के यौवन पर दाग लगने से रोकिए!


समय के साथ तेजी से बदल रहा लोगों का मन-मिजाज। परंतु पृथ्वी व चांद, सूरज वहीं है, ठीक इसी तरह स्त्री-पुरुष में आज भी भेदभाव कायम है। स्त्री चाहे जिस मुकाम पर पहुंच जाए, उसे पुरुष के सामने झुकना ही पड़ता है। अभी के दौर में आधुनिकता के नाम पर लड़कियां जींस-शर्ट अधिक पसंद कर रही हैं। इसी तरह हाईस्कूल तक पहुंचते ही अधिकतर लड़कियों का झुकाव युवा लड़कों की ओर हो जा रहा है। कॉलेज में पढऩे वाली लड़की का यदि ब्यॉय फ्रेंड नहीं है तो इसे अपमान समझा जा रहा है। वहीं, लड़के तो लड़कियों से दोस्ती करने के लिए बेचैन दिखते हैं। किशोर से युवा की तरफ बढऩे के साथ ही विपरीत सेक्स की ओर रुझान आम बात है। परंतु दिक्कत वहां से शुरू होती है, जब कोई अठारह वर्ष का युवक व युवती एक-दूसरे के करीब आने की कोशिश करते हैं। करीब ये दोस्ती में नहीं बल्कि पति-पत्नी की तरह संबंध बनाने के लिए आते हैं। इस वक्त इन्हें मां-बाप, भाई-बहन या फिर समाज का कोई ख्याल नहीं आता। इनका कैरियर बर्बाद हो जाएगा, ये कहीं के नहीं रहेंगे, इस बात का होश भी कच्ची उम्र के चलते इन्हें नहीं रहता। संबंध बनाने के दो-तीन महीने के बाद बिजली तब गिरती है, जब लड़की को पता चलता है कि वह मां बननेवाली है। मारे शर्म के या तो वह खुदकुशी की कोशिश करती है या फिर गर्भ गिराने की बदनामी झेलती है। इसके साथ ही कलंकित होता है उसका पूरा परिवार। वहीं, लड़की का साथी या तो गायब हो जाता है, या फिर लड़की के परिवार द्वारा किए गए यौन उत्पीडऩ के केस में फंस हवालात की सजा काटता है। ऐसे कम ही खुशनसीब लड़की होती है, जिसे गर्भ ठहरने के बाद ही लड़का कबूल कर लेता है। परंतु यह उम्र शादी की नहीं होती, सो परिवार वाले इसके लिए राजी नहीं होते और अन्तत: लड़की के पास गर्भ गिराने के अलावा कोई रास्ता नहीं रहता। इसमें कसूर किसका है लड़की या लड़का या फिर अभिभावक, जिन्होंने बच्चों को इतनी आजादी दे रखी थी? बच्चियां बड़ी होने के साथ मां-बाप की जिम्मेवारी बढ़ जाती है। सौ में साठ फीसदी अभिभावक यह नहीं देखते कि बच्ची यदि कॉलेज गई है तो उसने कितने क्लास किए। उसके मित्रों की सूची में कौन-कौन लड़के हैं। कॉलेज कैसे जाती है, आने में विलंब क्यों हुआ, जिस विषय का वह कोचिंग करना चाहती है, क्या वास्तव में उसे जरूरत है या फिर टाइम पास? ऐसी छोटी-छोटी चीजों पर नजर रखकर बच्चों को दिग्भ्रमित होने से बचाया जा सकता है। बेटों के पिता की जिम्मेवारी भी बेटी के पिता से कम नहीं है? यदि उनका बेटा किस लड़की के साथ गलत हरकत करता है। ऐसे में बदनामी उनकी भी होती है, समाज में उनका सिर भी झुकता है। ऐसे में थोड़ी से चौकसी इस भीषण समस्या से बचा सकती है। अत: चेतिए और बच्चों को दोस्त बनाइए ताकि ये आपको अपने दिल की बात बेहिचक बता सकें। इससे आप गंभीर संकट में फंसने से बच जाएंगे। बिहार के छोटे-छोटे गांव से भी नाबालिग लड़के-लड़कियां शादी की नीयत से भागने लगे हैं। वहीं, अस्पताल के आंकड़े बताते हैं कि गर्भ गिरानेवालों की संख्या भी बढ़ी है।

आंख और आंसू

आदमी दुखी होने पर भी रोता है, संवेदनशील हो और खुशी जाहिर करनी हो, तब भी उसकी आंखें सजल हो उठती हैं। आंख और आंसू भीतरी व्यक्तित्व को व्यक्त करते हैं। इसीलिए पहुंचे हुए महात्मा की आंख में आंख डालने का मौका मिले तो तप के क्या परिणाम होते हैं, यह जानने की कोशिश की जाए। जैसे नवजात शिशु की आंख निर्दोष होती है, वैसे ही संत की आंखों में परमात्मा की गहराई होती है और आंसू होते तो आंख का हिस्स हैं, पर धोते हृदय को हैं।


विभीषण से बात करते हुए सुंदरकांड में हनुमानजी द्रवित हो गए। उन्होंने श्रीराम के कृपालु चरित्र का वर्णन किया और तुलसीदासजी ने लिखा - अस मैं अधम सखा सुनु मोहू पर रघुबीर। कीन्ही कृपा सुमिरि गुन भरे बिलोचन नीर।। (सुंदरकांड दोहा-७) हे सखा! सुनिए, मैं ऐसा अधम हूं, पर श्रीराम ने तो मुझ पर भी कृपा ही की है। भगवान के गुणों का स्मरण करके हनुमानजी के नेत्रों में जल भर आया।


लेकिन भगवान को याद करके जब आंसू निकलते हैं तो वह अमृत होते हैं और दुनिया की याद में जो बहाए जाते हैं, वो जहर होते हैं। आंख के आंसू भक्ति में जरूर बहना चाहिए, क्योंकि जिनकी आंख के आंसू सूख गए, उनके लिए भक्ति कठिन होगी।


आंसू हृदय को न सिर्फ धोते हैं, बल्कि उन बातों से ओतप्रोत रखते हैं, जो उन्हें परमात्मा तक ले जाती हैं, जो हमें प्रेमपूर्ण बनाती हैं। इसलिए अकारण आंसू न रोकें, लेकिन इतना आश्वासन जरूर अपनी आंखों को दें कि आंसू भगवान से जुड़ने के लिए सेतु का काम करेंगे, प्रेम का भाव प्रदर्शित करने की इबारत बनेंगे।

आइए, लें एक शपथ कि धरती को बचाएंगे

आइए, लें एक शपथ कि धरती को बचाएंगे

जन्म देने वाली मां यदि बीमार पड़ जाती हैं, तो हमारी नींद उड़ जाती है। हम उसे ठीक करने के लिए दिन-रात एक कर देते हैं, जबकि इस मां ने दो-चार ही पुत्र-पुत्रियां जने हैं। वहीं, दूसरी 'मां' जिसे दुनिया धरती माता के नाम से जानती है, पुकारती है, इसके तो कई करोड़ 'बेटे' हैं। यह हमें खाना देती है, रहने के लिए जगह देती है। यूं कहें कि दुनिया में जितनी चीजें दिखती हैं, सबकुछ इसी 'मां' की देन है। इसके बावजूद आज हम इस 'मां' के दुश्मन बन गए हैं। हरे-भरे वृक्ष काट रहे हैं। इसके गर्भ में रोज खतरनाक परीक्षण कर रहे हैं। इतना जल बर्बाद किया कि कई हिस्से जलविहीन हो गए हैं। लाख कोशिशों के बाद भी दुनिया भर के वैज्ञानिक 'दूसरी पृथ्वी' को नहीं ढूंढ सकें। 1970 के 22 अप्रैल को पहली बार पृथ्वी दिवस मनाया गया। तत्पश्चात यह सिलसिला साल-दर-साल जारी है। क्या आपने सोचा है कि मौसम में बदलाव क्यों हो रहा है? गर्मियां और गर्म क्यों हो रही हैं? सर्दियां सिमटकर माह भर क्यों रह गई हैं? बेमौसम बारिश, बेमौसम जलसंकट, घटते जीव-जंतु व पक्षी कहीं न कहीं चीख-चीखकर इस बात के संकेत दे रहे हैं कि धरती माता के बचाव के लिए सबको आगे आना चाहिए। वरना हमारे पास पछताने के अलावा कुछ नहीं बचेगा। ग्लोबल वार्मिंग यानी जलवायु परिवर्तन आज पृथ्वी के लिए बड़ा संकट बन गया है। पृथ्वी के संबंध में कई तरह की भविष्यवाणियां भी की जा चुकी हैं। मसलन-दुनिया अब नष्ट हो जाएगी, पृथ्वी जलमग्न हो जाएगा वगैरह-वगैरह। विकास की होड़ में विश्व के 70 फीसदी विकसित देशों ने पृथ्वी को जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है, पहुंचा रहे हैं। इसका खामियाजा पूरी दुनिया को उठाना होगा। बता दें कि कई गैसें सूर्य के प्रकाश को धरती पर आने तो देती हैं, लेकिन इसके कुछ भाग को वापस लौटने में बाधक बन जाती है। इसी प्रक्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव कहते हैं। ये गैसें है-कार्बन डाइ-आक्साइड, कार्बन मोनो आक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड। ये गैसें हमारे वायुमण्डल में उपस्थित ओजोन परत को नुकसान पहुंचा रही हैं। वायुमण्डल में धीरे-धीरे छिद्र होता जा रहा है, जो सूर्य से पृथ्वी पर आने वाली अल्ट्रा वायलेट किरणों को रोकने में असफल हो रही है। नतीजतन, पृथ्वी का तापमान बढ़ता ही जा रहा है। तीन सौ सालों में वैश्विक तापमान 0.6 डिग्री सेल्सियस बढ़ा है। आइए, पृथ्वी दिवस (22 अप्रैल 2011) को हम सब शपथ लें कि अपनी धरती माता को बचाने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। मसलन-पौधरोपण को खुद के रूटीन में शामिल करेंगे। इसके लिए औरों को भी प्रेरित करेंगे। पॉलीथिन का इस्तेमाल नहीं करेंगे। कागज का इस्तेमाल कम से कम करेंगे। इससे कई बांस के पेड़ कटने से बच जाएंगे। सूख रहे तालाब, कुएं को फिर से जीवित करेंगे। ब्रश करते वक्त बेसिन का नल धीमे खोलेंगे। सड़े-गले सामान सही जगह पर फेंकेंगे। खाना बनाने के लिए बायो गैस या कुकिंग गैस का ही उपयोग करेंगे। वर्षा का जल संचय की बात को गंभीरता से लेंगे। जरा सोचिए, इस पृथ्वी ने हमें क्या नहीं दिया है। दुनिया में जितनी भौतिक चीजें हैं, सब इसी की तो देन है। इसके बावजूद, हम इसे रोज नुकसान पहुंचा रहे हैं?

प्‍यार का इजहार

अगर आप प्‍यार का इजहार जल्‍दी करने में विश्‍वास करते हैं तो आपकी यह आदत आपको गर्लफ्रेंड से दूर कर सकता है। क्‍योंकि  हाल ही में अमेरिका के एक इंस्टिट्यूट द्वारा किए गए इस सर्वे में खुलासा हुआ है कि महिलाएं जल्दी यानी तीन महीने की रिलेशनशिप में प्यार के इजहार करने वाले शख्स पर विश्वास नहीं करती है।

इसके विपरीत महिलाएं ऐसे मर्दों के वरीयता देती हैं, जो उनके साथ रिलेशनशिप में काफी समय लेते हैं और फिर अपने प्यार का इजहार करते हैं।

सर्वे में पता चला है कि पुरुष, महिलाओं की अपेक्षा 6 हफ्ते जल्दी ही अपने प्यार का इजहार कर देते हैं। अर्थात पुरुष 97.3 दिनों में अपने प्यार का इजहार कर देते हैं।

रिसर्चर्स का कहना है कि ऐसा लगता है कि जल्दी प्यार का इजहार करने के पीछे पुरुषों का मकसद सेक्स संबंध स्‍थापित करने की तीव्र इच्छा होती है।

खतरे में आरटीआई कार्यकर्ता

खतरे में आरटीआई कार्यकर्ता

सूचना के अधिकार का इस्तेमाल कर सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार को उजागर करने में लगे आरटीआई कार्यकर्ता रामदास घाडेगावकर का शव नांदेड़ में बरामद हुआ है। रामदास की मौत का मामला गुजरात के आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा की हत्या के चंद हफ्तों बाद सामने आया है। जेठवा गिर वन क्षेत्र में अवैध खनन को उजागर करने में लगे हुए थे। इस तरह से सात महीने में आठ से ज्यादा लोग इस अधिकार की बलिबेदी पर चढ़ चुके हैं। इनका कुसूर बस इतना था कि इन लोगों ने सवाल पूछा था। इनके सवालों ने भ्रष्टाचारियों की पोलपट्टी खोल दी थी। भूमि घोटाले का पर्दाफाश भी इन्हीं सवालों के जरिए हुआ था। ये ऐसे सवाल थे, जिनसे भ्रष्टाचारियों की नींद हराम हो गई थी। सच और सूचना के ये सिपाही भ्रष्टाचारियों के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गए थे। नतीजतन, पिछले सात महीनों में आठ आरटीआई कार्यकर्ता अपनी जान गवां चुके हैं। बीती 20 जुलाई को ही अहमदाबाद में आरटीआई कार्यकर्ता अमित जेठवा की सरेआम गोली मारकर हत्या कर दी गई। सूचना के अधिकार कानून के तहत जेठवा ने गीर के जंगलों में अवैध खनन के मामले का पर्दाफाश किया था। पुलिस उनकी हत्या के पीछे खनन माफिया का हाथ होने की बात कह रही है, लेकिन जेठवा के पिता भीखू भाई अपने बेटे की हत्या के पीछे भाजपा नेता एवं सांसद दीनू भाई सोलंकी का हाथ होने की बात कह रहे हैं। वैसे इस आरोप में दम भी है, क्योंकि जेठवा ने भाजपा सांसद दीनू भाई सोलंकी के खिलाफ भी अवैध खनन की शिकायत की थी और इसी वजह से सोलंकी पर एक बार 40 लाख रुपये का जुर्माना भी लगा था।जेठवा सोलंकी के खिलाफ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा का चुनाव भी लड़ चुके थे। कुछ समय पहले भी अमित जेठवा पर कातिलाना हमला हो चुका था। जेठवा के आरटीआई आवेदनों के कारण अवैध खनन से जुड़े कई मामले सामने आए थे। साथ ही एक सीमेंट कंपनी को भी जेठवा के आवेदनों से काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था। जेठवा के पिता भीखू भाई अपने बेटे की हत्या की जांच सीबीआई से कराना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि चूंकि मामला भाजपा के सांसद से जुड़ा है, इसलिए राज्य की भाजपा सरकार और उसकी पुलिस निष्पक्ष होकर जांच नहीं कर पाएगी।भीखू भाई की यह आशंका बहुत हद तक सही भी है। सवाल है कि जिस व्यवस्था के खिलाफ कोई नागरिक एक सूचना निकालता है और उसे सार्वजनिक करता है, वही व्यवस्था क्यों और कितनी सुरक्षा उस नागरिक को देना चाहेगी। निष्पक्ष जांच की बात तो बहुत दूर की है। यह सच्चाई कौन नहीं जानता कि किसी भी बड़े घोटाले में कौन-कौन से और किस तरह के लोग शामिल होते हैं। भारत में जितने भी बड़े घोटाले सामने आए हैं, उनमें किसी नेता या अफसर की संलिप्तता जरूर होती है। ऐसे में अगर कोई आम आदमी किसी घोटाले का पर्दाफाश करता है तो सोचिए क्या होगा।पुणे के सतीश शेट्टी के साथ क्या हुआ? भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सतीश शेट्टी की भी हत्या कर दी गई। सुबह-सुबह जब वह घर से बाहर निकले तो उन पर धारदार हथियारों से हमला कर दिया गया। 38 वर्षीय सतीश पुणे से 40 किलोमीटर दूर तालेगांव में रहते थे। सूचना के अधिकार के तहत सतीश कई मामलों का पर्दाफाश कर चुके थे। सतीश पुणे की भ्रष्टाचार उन्मूलन समिति के संयोजक भी थे। आरटीआई का इस्तेमाल कर सतीश शेट्टी ने महाराष्ट्र में कई जमीन घोटालों और मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे में घोटाले को उजागर किया था।इसी वजह से सतीश भू-माफियाओं के निशाने पर आ गए थे। आरटीआई की सहायता से सतीश ने अवैध बंगले के निर्माण और मिट्टी के तेल एवं राशन की कालाबाजारी के विरोध में भी आवाज उठाई थी। मई, 2010 में महाराष्ट्र के ही दत्ता पाटिल, जो अन्ना हजारे के करीबी सहयोगी भी थे, की हत्या कर दी गई। पाटिल आरटीआई के जरिए भ्रष्टाचार के कई मामले सामने लाए थे, जिसकी वजह से एक पुलिस उपाधीक्षक और एक वरिष्ठ पुलिस इंस्पेक्टर को नौकरी से हटा दिया गया था। नगर निगम के अफसरों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू हो गई थी। पाटिल ने एक बिल्डर के खिलाफ भी कई मामले पुलिस में दर्ज कराए थे।सच और ईमानदारी से काम करने वाले पाटिल को इन सबकी कीमत अपनी जान गंवाकर चुकानी पड़ी। अप्रैल, 2010 में महाराष्ट्र के वि_ल गीते की हत्या भी इसलिए कर दी गई, क्योंकि उन्होंने आरटीआई के इस्तेमाल से गांव के एक स्कूल में चल रही धांधली का पर्दाफाश किया। बाद में एजूकेशनल सोसायटी चलाने वाले एक दबंग आदमी के बेटे ने गीते पर हमला कर दिया। इन सारी घटनाओं में जो समानता दिखती है, वह यह है कि सभी मामलों के आरोपी ताकतवर लोग हैं।अप्रैल, 2010 में ही आंध्र प्रदेश के सोला रंगाराव को सवाल पूछने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। राव ने अपने गांव में नाला निर्माण के लिए जारी किए गए फंड के बारे में सवाल पूछे थे। राव के परिवारवालों का आरोप है कि राव की हत्या में वही लोग शामिल हैं, जिन्होंने नाला निर्माण के फंड से पैसे चुराए हैं। फरवरी, 2010 में बिहार के बेगूसराय निवासी शशिधर मिश्रा की गोली मारकर हत्या कर दी गई। उन्हें लोग खबरी लाल के नाम से जानते थे, क्योंकि उन्होंने कई घोटालों का भंडाफोड़ किया था। जाहिर है, कुछ लोगों को यह सब पसंद नहीं आया होगा। नतीजा यह निकला कि शशिधर मिश्रा के सिर में गोली मार दी गई। यानी सच का एक और सिपाही मारा गया।हिंसा की उक्त सभी घटनाएं इसी साल की हैं, लेकिन दो साल पहले भी झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता ललित मेहता की हत्या इसीलिए हुई थी कि उन्होंने सूचना के अधिकार के तहत राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम का सोशल ऑडिट कराने का प्रयास किया था। वह इस योजना के तहत किए गए खर्च को आधिकारिक तौर और धरातल पर जांचना चाहते थे, लेकिन सोशल ऑडिट से एक दिन पहले ही उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई। इंजीनियर से सामाजिक कार्यकर्ता बने ललित मेहता की किसी से दुश्मनी नहीं थी।वह तो पलामू जिले में भोजन के अधिकार अभियान के प्रमुख सदस्य थे। पुलिस ने उनके शव का जल्दबाजी में पोस्टमार्टम कराया और घटनास्थल से 25 किलोमीटर दूर ले जाकर दफना दिया। ललित मेहता की हत्या के 12 दिनों बाद सोशल ऑडिट हुआ। ऑडिट से पता चला कि जिले में योजना के तहत खर्च किए गए 73 करोड़ रुपये का एक बड़ा हिस्सा ठेकेदारों, अधिकारियों और विकास माफियाओं की जेब में चला गया।

महिला आरक्षण

देश की आधी आबादी को आरक्षण के सपने दिखाए गए, आरक्षण दिया गया और कानून को लागू भी किया गया। और लागू होने के बाद सरकार ने अपनी उपलब्धियां गिनवाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन किसी ने भी कानून लागू होने के बाद यह जानने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर योजनाओं का हाल क्या है?
जिस आरक्षण कानून को लेकर सरकार बड़ी-बड़ी डींगें हांक रही है उसे कहां तक क्रियांवित किया जा रहा है? आखिर जिस महिला वोट बैंक, को आरक्षण दिया गया है उसे इसका क्या और कितना फायदा मिल रहा है महिलाओं की पहचान बनाने और सशक्तिकरण के लिए यह कानून किस हद तक कारगर हैं? अगर इन सभी मुद्दों की जांच की जाए तो नतीजा वही निकलेगा ढांक के तीन पात। इसका सबसे बड़ा उदाहरण देखने को मिल रहा है उत्तर प्रदेश में चल रहे त्रिस्तरीय चुनावों में। यहां अखबारों में छपने वाले विज्ञापनों में महिला प्रत्याशी के साथ-साथ उसके पति और ससुर का नाम छापा जा रहा है और यहां तक कि किसी-किसी विज्ञापन में तो नाम है महिला प्रत्याशी का और फोटो है उसके पति का।
आरक्षण के तहत बड़ी संख्या में महिलाएं भी पंचायत चुनाव में उतरी हैं। लेकिन इनकी हैसियत किसी मुखौटे से ज्यादा नहीं है। जो सीट महिला आरक्षण में चली गयी है, उस सीट पर नेताजी ने मजबूरी में अपनी पत्नि, बहन, मां या पुत्रवधु को पर्चा भरवा दिया है। इसलिए पोस्टरों, बैनरों और अखबार के विज्ञापनों में वह हाथ जोड़े खड़ी हैं। साथ में यह जरुर लिखा है कि उम्मीदवार किसी की पत्नी, बहु, मां या बेटी है। साथ में पति, ससुर, बेटे या भाई की तस्वीर भी हाथ जोड़े लगी हुई है।
सब जानते हैं कि चुनाव महिला नहीं लड़ रही बल्कि महिलाओं के आड़ में पुरुष लड़ रहा है। इसलिए महिला उम्मीदवारों की सूरत सिर्फ पोस्टरों, बैनरों और अखबारों में ही दिख रही है। कहीं-कहीं तो मुसलिम महिला उम्मीदवार की सूरत ही सिरे से गायब है। चुनाव प्रचार से भी महिलाएं दूर है। इसकी जिम्मेदारी पुरुषों ने संभाल रखी है। असली उम्मीदवार को तो पता ही नहीं कि बाहर क्या हो रहा है। वह तो आज भी घर के अन्दर चूल्हा झोंक रही है, भैंसों को सानी कर रही है या गोबर से उपले पाथ रही है। किसी महिला के निर्वाचित होने के बाद भी उनकी हैसियत कुछ नहीं होगी। सारा काम पुरुष ही करेगा। महिला तो सिर्फ रबर स्टाम्प होगी। सबने सोचा था कि महिलाओं को आरक्षण देने से महिलाओं का सशक्तिकरण होगा। क्या इन हालात में महिलाओं का सशक्तिकरण हो सकता है? कुछ लोग जब महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मुखालफत करते हैं तो इसके पीछे एक तर्क यह भी होता है कि इससे महिलाओं का सशक्तिकरण नहीं होगा, बल्कि पुरुष ही अपनी राजनैतिक महत्वकांक्षा को पूरा करेगा। यदि फायदा होगा भी तो शबाना आजमी, जया प्रदा या नजमा हैपतुल्ला जैसी महिलाओं का होगा, जो पहले से ही पुरुषों से भी ज्यादा सशक्त हैं। ग्राम पंचायत को तो छोड़ दें। मैट्रो शहरों के नगर-निगम में चुने जाने वाली ज्यादतर महिला पार्षद भी बस नाम की ही पार्षद होती हैं। सारा काम तो पार्षद पति ही करते हैं। इस तरह से पार्षद पति का एक पद स्वयं ही सृजित हो गया है। ऐसे कई वार्ड हैं जहां महिलाएं प्रतिनिधि तो हैं, पर किसी ने आज तक उनका चेहरा नहीं देखा है।
लोकसभा और विधान सभा के चुनाव लगातार महंगे होते गए। धन और बल वाला आदमी ही दोनों जगह जाने लगा। आम आदमी के लिए लोकसभा और विधानसभा में जाना सपना सरीखा हो गया है। नैतिकता, चरित्र, आदर्शवाद और विचारधारा अब गुजरे जमाने की बातें हो गयी हैं। अबकी बार जिला पंचायत और ग्राम पंचायत जैसे छोटे चुनाव में बहता पैसा इस बात का इशारा कर रहा है कि अब इन छोटे चुनावों में भी उतरने के लिए आम आदमी के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है। धन और बल ही आज के लोकतंत्र का असली चेहरा है।

मौत के साए में जिंदगी

मौत के साए में जिंदगी
दिल्ली के लक्ष्मी नगर में इमारत ढह जाने का जो दर्दनाक हादसा हुआ है, उसने सबको दहला कर रख दिया है। इसमें 70 लोगों की मौत हो गई और सैकड़ों लोग जख्मी हुए। ऐसा ही कुछ मंजर गाजियाबाद सहित पूरे वेस्ट यूपी में भी देखने को मिल सकता है। यहां लक्ष्मी नगर जैसी कई जर्जर इमारतें हैं, जो कभी भी ढह कर मलबे में तब्दील हो सकती हैं। इमारतों में नीचे दुकानें हैं और ऊपर लोग रहते हैं। अगर भविष्य में यह इमारतें गिरीं तो तय है कि बड़ी संख्या में जान-माल का नुकसान होगा। इन बातों से बाखबर प्रशासन कन्नी काटता नजर आ रहा है, तो वहीं इन इमारतों का जन्मदाता जीडीए नींद में है। इमारतों में भूकंप के मामूली झटके बर्दाश्त करने की जरा भी कूवत नहीं है। भूकंप के हल्के झटके भर से जर्जर इमारतें ताश के पत्तों की तरह कभी भी भरभरा सकती हैं।
हाई रिस्क जोन में बहुमंजिला इमारतेंभूकंप शब्द से ही लोगों में दहशत फैल जाती है। खासकर दिल्ली और एनसीआर के लोगों में। यह क्षेत्र हाईरिस्क जोन में आने के कारण सबसे ज्यादा संवेदनहै। बहुमंजिला इमारतों की भरमार होने से यहां भूकंप आने पर जान-माल का भारी नुकसान हो सकता है।
दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, गुडग़ांव, फरीदाबाद जैसे शहरों में जगह की कमी के कारण ऊंची बिल्डिंग बनाने का चलन काफी समय से चल रहा है। लेकिन बहुमंजिला इमारत बनाने का यही चलन लोगों के लिए मुसीबत बन गया है। प्राधिकरण निजी बिल्डरों से भूकंपरोधी भवन नहीं बनवा पा रहे। भूकंप से बचाव के उपाय केवल कागजों तक सिमट कर रह गए हैं। गनीमत बस इतनी है कि अभी तक दिल्ली और एनसीआर में बड़ा भूकंप नहीं आया है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस क्षेत्र में रिक्टर स्केल पर 7 तक की तीव्रता का भूकंप आ सकता है। 4.5 से अधिक तीव्रता का भूकंप आने पर इमारतों को सबसे ज्यादा नुकसान होगा। भूस्खलन के साथ-साथ बड़े-बड़े भवन ढह सकते हैं। भूमिगत पाइप लाइनों के टूटने का खतरा बढ़ जाता है। भूकंप की तीव्रता बढऩे पर नदियों का मार्ग तक बदल सकता है।

यमुना तीरे इमारतों की बाढ़यमुना के किनारे के रेतीले इलाकों में तेजी से बहुमंजिला इमारतें खड़ी की जा रहीं हंै। सबसे खतरनाक बात यह है कि यहां की ऐसी अनेक बहुमंजिला इमारतें हैं, जो भूकंप का हल्का झटका भी नहीं सह सकतीं। भूकंप वैज्ञानिकों के अनुसार अगर चार रिक्टर पैमाने की भी हलचल हुई तो ताश के पत्तों की तरह इस क्षेत्र की इमारतें ढह जाएंगी।
केन्द्र सरकार के शहरी भूकंप भेदता यूनीकरण कार्यक्रम (यूईवीआरपी) के अधिकारियों ने नदी में निर्माण को खतरनाक करार दिया है। ऐसी स्थिति में लोगों को यही कहा जाना चाहिए कि नदी के नहीं तो खुद के जीवन के लिए ही सही ऐसी जगहों पर बहुमंजिला इमारतें बनाने से बचें। आगरा भूकंपीय खतरे की दृष्टि से तीसरे स्थान पर है। यहां भूकंप का झटका कभी भी लग सकता है। यूपी के राहत आयुक्त के नेतृत्व में चल रही यूईवीआरपी के प्रोजेक्ट समन्वयक जीवन पंडित के मुताबिक ठोस मिट्टी पर बनी इमारतों पर भूकंप का असर कम होता है। जबकि यमुना और इसके तट रेत से भरे हंै। भूकंप होने पर रेत में भूजल मिल जाता है, इसे लिक्वफिकेशन कहते हैं। यह दलदल बनाने का काम करता है। इससे नींव कमजोर हो जाती है और भवन ध्वस्त हो सकते हंै। भूकंप की दृष्टि से कभी भी नदी के पास निर्माण नहीं करना चाहिए।

क्या कहता है जियोलॉजिकल सर्वेजियोलॉजिकल सर्वे में यह बात सामने आई है कि गाजियाबाद सहित पूरा दिल्ली-एनसीआर फोर्थ जोन में है। यानि हल्का भूकंप का झटका भी तबाही ला सकता है। ट्रांस हिंडन क्षेत्र में रियल स्टेट कारोबार के फैलने से भारी मात्रा में जल दोहन हो रहा है। जिससे मिट्टी खिसकती है और अत्याधिक बारिश से इमारतों में दरार की संभावना है। जबकि भू-जल पर्याप्त मात्रा में होने से दबाव बना रहता है और मिट्टी नहीं खिसकती। सर्वे के अनुसार यदि प्राकृतिक तरीके से मिट्टी खिसकती है तो कोई खतरा नहीं, लेकिन दोहन से इमारतों की नींव कमजोर हो सकती है।
भूकंप से सुरक्षित बनाने के लिए इमारतों को रिक्टर स्केल मैग्निटयूड 6 की तीव्रता का भूकंप झेलने के लिए तैयार किया जाता है। इसके लिए बिल्डिंग के कंस्ट्रक्शन के वक्त ही उसे भूकंपरोधी बनाने के सभी उपाय किए जाते हैं। घर खरीदने के पहले किसी सर्टिफाइड स्ट्रक्चरल इंजीनियर का सर्टिफिकेट, जिसमें रिक्टर स्केल मैग्निटयूड कम से कम छह रखा गया हो, उसे जरूर देखना चाहिए।

भूकंप की वजह
भूकंप आज भी ऐसा प्रलय माना जाता है जिसे रोकने या काफी समय पहले सूचना देने की कोई प्रणाली वैज्ञानिकों के पास नहीं है। प्रकृति के इस तांडव के आगे सभी बेबस हो जाते हैं। सामने होता है तो बस तबाही का ऐसा मंजर जिससे उबरना आसान नहीं होता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण चीन और हैती में आए भूकंप हैं।
भूकंपों की उत्पत्ति धरती की सतह से 30 से 100 किलोमीटर अंदर होती है। सतह के नीचे धरती की परत ठंडी होने और कम दबाव के कारण भंगुर होती है। ऐसी स्थिति में जब अचानक चट्टानें गिरती हैं तो भूकंप आता है। एक अन्य प्रकार के भूकंप सतह से 100 से 650 किलोमीटर नीचे होते हैं।
धरती की सतह से काफी गहराई में उत्पन्न अब तक का सबसे बड़ा भूकंप 1994 में बोलीविया में रिकॉर्ड किया गया। सतह से 600 किलोमीटर दर्ज इस भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8.3 मापी गई थी। हालांकि वैज्ञानिक समुदाय का अब भी मानना है कि इतनी गहराई में भूकंप नहीं आने चाहिए क्योंकि चट्टान द्रव रूप में होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि विभिन्न रासायनिकों क्रियाओं के कारण भूकंप आते होंगे।
जानवरों को होता है भूकंप का अहसास!
बचपन में बड़े बुजुर्गों से सुना था कि जब भूकंप आने को होता है तो पशु-पक्षी कुछ अजीब हरकतें करने लगते हैं। चूहे अपनी बिलों से बाहर आ जाते हैं। अगर यह सही है तो वैज्ञानिक पशु-पक्षियों की इस अद्भूत क्षमता को भूकंप की पूर्व सूचना प्रणाली में क्यों नहीं बदल सकते। अगर ऐसा संभव हो जाए तो प्रकृति की इस तबाही पर मानव विजय पा सकेगा। भुज में आए भूकंप के समय ऐसा देखा गया था कि पशु वहां से भागने लगे थे।

घर बनाने या खरीदने के पहले इन बातों का रखें ध्यान
निर्माण कार्य शुरू करने से पहले उस जगह की मिट्टी की जांच जरूरी होती है। इससे पता चलता है कि उसमें इमारत का वजन सहन करने की क्षमता है या नहीं। मिट्टी की क्षमता के आधार पर ही इमारत में फ्लोर्स की संख्या तय की जाती है। और डिजाइन तैयार किया जाता है।
अब सवाल उठता है कि मिट्टी की जांच कहां कराई जाए? मिट्टी की जांच की जिम्मेदारी सरकार से मान्यता प्राप्त प्राइवेट लैब संभालती है। इसके लिए वह बाकायदा एक तय फीस चार्ज करती है। यह 20 हजार से एक लाख रुपये तक हो सकती है। जांच के बाद लैब सर्टिफिकेट जारी करती है।
जांच में यह पता चलता है कि मिट्टी प्रति स्क्वेयर सेंटीमीटर कितना लोड झेल सकती है। वॉटर लेवल और बियरिंग कपैसिटी का सही अनुपात क्या है। मिट्टी की दशा क्या है यानी मिट्टी हार्ड है या सॉफ्ट।

बेसमेंट का ध्यान जरूरी
ललिता पार्क (दिल्ली) में गिरी इमारत के बेसमेंट में पानी भरा था। ऐसा माना जा रहा है कि नींव में पहुंचे पानी ने बिल्डिंग को कमजोर बना दिया। बेसमेंट इमारत का आधार होता है, इसलिए इसका मजबूत होना बहुत जरूरी है।
इमारत की वॉटर प्रूफिंग बहुत जरूरी होती है। इमारत का बिल्डर ही बेसमेंट की वॉटर प्रूफिंग के लिए जिम्मेदार होता है। जब उस इलाके में वॉटर लेबल ज्यादा हो, जैसे यमुना और हिंडन किनारे वाले इलाके, तब उसकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। संबंधित जगह के वॉटर लेवल के अनुसार ही यह तय किया जाता है कि बेसमेंट को किस तरह की वॉटर प्रूफिंग सुरक्षित रख सकती है। ऊंचे वॉटर लेवल वाले इलाकों में आमतौर पर बॉक्स टाइप वॉटर प्रूफिंग की जाती है, जिसमें नींव और चारों तरफ की दीवारों पर कोटा स्टोन की परत चढाई जाती है।

निर्माण सामग्री की करें जांच
मिट्टी का ठीक होना ही इमारत की सुरक्षा की लिए काफी नहीं है। यह भी जरूरी है कि इमारत को तैयार करने में लगाए जाने वाले सामग्री की गुणवत्ता अच्छी हो। इस सामग्री में क्रंक्रीट, सीमेंट, ईंट, सरिये आदि शामिल होती हैं। निर्माण सामग्री के ठीक होने या नहीं होने के बारे में ज्यादातर संतुष्टि सिर्फ देखकर ही की जाती है। फिर भी कुछ हद तक सावधानी बरती जा सकती है।
सबसे पहले प्लास्टर की जांच करनी चाहिए। इसके लिए एक कील या गाड़ी की चाबी लें, इसे दीवार पर हाथ से गाढऩे की कोशिश करें। अगर कील दीवार में धंस जाती है तो रेत झड़ता है, तो साफ है कि खराब सामग्री लगाया गया है। यदि कील आसानी से नहीं धंसती, तो समझ सकते हैं कि सामग्री अच्छी है और काफी तराई भी की गई है।
यदि आप संतुष्ट नहीं हैं, तो जांच में प्रोफेशनल की मदद लें सकते हैं। कंक्रीट फ्रेमवर्क के तहत आने वाली चीजों की जांच किसी प्रफेशनल से कराई जा सकती है। इस फ्रेमवर्क के अंतर्गत पिलर, नींव, स्लैब्स आदि आते है। प्रोफेशनल स्ट्रक्चरल इंजीनियरिंग से सर्टिफिकेट लिया जा सकता है।
थर्ड पार्टी से गुणवत्ता जांची जा सकती है। इस प्रक्रिया के तहत बिल्डर मिट्टी समेत सभी निर्माण सामग्री आदि की गुणवत्ता की जांच कराता है। यह जांच प्राइवेट एजेंसियां तय मानकों के आधार पर करती हैं, जिन्हें मानना बिल्डर के लिए जरूरी होता है। सभी चीजों की जांच के बाद सर्टिफिकेट दिए जाते हैं, जिन्हें एक बार जरूर देख लेना चाहिए।

दस्तावेज जरूर लें
अगर आप इमारत की सुरक्षा के बारे में जांच-पड़ताल कर रहे हैं, लेकिन उसके वैध या अवैध होने पर लापरवाही कर जाते हैं, तो आप बड़ी भूल कर रहे हैं। कोई भी बिल्डर या सरकार तभी तक जिम्मेदार है, जब तक इमारत लीगल है।
नेशनल बिल्डिंग कोड के मानक, जो सीपीडब्ल्यूडी जैसी सरकारी संस्थाओं के पास या इंटरनेट पर उपलब्ध हैं।
सबके साथ यह भी जानना जरूरी है कि उस क्षेत्र में बिल्डिंग में कितने फ्लोर की इजाजत है, फ्लोर एरिया अनुपात के अनुसार कितनी जगह पर निर्माण किया जा सकता है, जोन के अनुसार, बिल्डिंग की अधिकतम ऊंचाई कितनी रखी जा सकती है, किस तारीख को प्रोजेक्ट लॉन्च किया गया, यानी बिल्डिंग कितनी पुरानी है।

अग्नि सुरक्षा
घर लेने से पहले यह संतुष्टि कर लेना भी जरूरी है कि बिल्डिंग को आग के खतरों से सुरक्षित बनाया गया है या नहीं। इसके यह जांच कर लें कि अगर मल्टीस्टोरी अपार्टमेंट है तो फायर डिपार्टमेंट से नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट मिला है कि नहीं।

स्ट्रक्चरल इंजीनियर से जरूर लें सलाह
इमारत बनवाने या फ्लैट खरीदने से पहले किसी स्ट्रक्चरल इंजीनियर से सलाह जरूर लें। यह सलाह ड्रॉइंग डिटेल्स बनवाने तक ही सीमित न रहे। उस डिटेल्स पर पूरी तरह अमल भी करें। घर के निर्माण के वक्त स्ट्रक्चरल इंजीनियर से यह चेक करवाते रहें कि निर्माण सही हो रहा है या नहीं। आर्किटेक्ट और स्ट्रक्चरल इंजीनियर का आपसी मेल-जोल होना बहुत जरुरी है। अगर खुद घर बनवा रहे हैं, तो निर्माण पर आने वाली कुल लागत का अनुमान लगाना आसान हो जाता है।

कानूनी प्रावधान
नेशनल बिल्डिंग कोड के अनुसार बिल्डिंग के डिजाइन व निर्माण का कार्य किया जाता है। इसके आधार पर तैयार की गई इमारत को सुरक्षा के आधार पर 100 फीसद खरा माना जा सकता है। इसे सबसे पहले 1970 में प्लानिंग कमिशन ने लागू किया था। 1983 में इसे संशोधित किया गया। इसके बाद दो बार 1987 में और एक बार 1993 में इसमें सुधार किए गए। बाद में नेशनल बिल्डिंग कोड ऑफ इंडिया 2005 लाया गया। 'एनबीसी 2005Ó का निर्माण ब्यूरो आफ इंडियन स्टैंडर्ड, म्यूनिसिपल एडमिस्ट्रिेशन, पब्लिक बॉडीज और प्राइवेट एजेंसी वगैरह ने मिलकर तैयार किया। इसका मकसद डेवलेपमेंट कंट्रोल रूल्स और बिल्डिंग की आम जरूरतों, फायर सेफ्टी जरूरतों, मटीरियल क्वॉलिटी, स्ट्रक्चरल डिजाइन, कंट्रक्शन और प्लंबिंग सर्विस आदि का ध्यान रखना है। जो बिल्डिंग कोड के मापदंड पर फिट नहीं बैठतीं, उन पर पेनल्टी भी ली जा सकती है या प्रोजेक्ट ही निरस्त भी किया जा सकता है।

कहां है लैबोरेट्रीज
देशभर में विभिन्न चीजों की जांच के लिए लैबोरेट्रीज को मान्यता 'नेशनल एक्रीडिशन बोर्ड फॉर टेस्टिंग एंड कैलिब्रेशन लैबोरेट्रीजÓ की ओर से दी जाती है। यह बोर्ड सरकार के विज्ञान एवं तकनीक मंत्रालय के तहत बनाया गया है, जिसका मुख्यालय न्यू महरौली रोड पर सत्संग विहार मार्ग पर स्थित है। बिल्डिंग मटीरियल और मिट्टी आदि की जांच के लिए बोर्ड ने दिल्ली-एनसीआर में कई लैब्स को अधिकृत किया के लिए फोन नंबर 011-46499999 पर भी संपर्क कर सकते हैं।

भुज और लातूर में भूकंप के बाद जिंदगी26 जनवरी, 2001 का वो दिन भुलाए नहीं भूलता। इस दिन गुजरात के भुज में आए भूकंप ने हजारों लोगों को लील लिया। कितने घायल हुए, कितने अपनों से बिछड़ गए। यही कहर 30 सितंबर, 1993 में महाराष्ट्र के लातूर में बरपा था। भुज में 13 हजार 805 लोग मरे, तो लातूर में 7 हजार 928 लोग काल के गाल में समा गए। लेकिन इन दोनों घटनाओं में जीत जिंदादीली और हिम्मत की हुई थी। लोगों ने हिम्मत से काम लिया। उन्होंने इस घटना से सबक लेते हुए खुद को तैयार किया। आज इन दोनों जगहों पर भूकंपरोधी इमारतें बन चुकीं हैं। ये इमारतें हल्के -फुल्के भूकंप के झटके को यूं ही सह सकती हैं।


ऐसे बनाएं भूकंपरोधी इमारतें
आइए जानते हैं भूकंपरोधी इमारतों को किस तकनीक के सहारे बनाया जा सकता है। भूकंप के दौरान इमारतों को क्षतिग्रस्त होने से बचाने के लिए दो आधारभूत तकनीक को अपनाया जा सकता है। इनमें पहला, बेस आइसोलेसन डिवाइस और दूसरा सिसमिक डैंपर है।

बेस आइसोलेसन डिवाइस
इस तकनीक से इमारत को ग्राउंड से एक रोलर के सहारे अलग रखा जाता है। इससे भूकंप आने पर इमारत को प्रत्यक्ष रूप से झटका नहीं लगता है। और इमारत क्षतिग्रस्त नहीं हो पाती है।

सिसमिक डैंपर
इस तकनीक से एक विशेष डिवाइस के जरिए काम लिया जाता है। यह डिवाइस भूकंप के समय पैदा होने वाली एनर्जी को अवशोषित कर लेती है। इस तरह से भूकंप का झटका इमारत को महसूस नहीं होता है।
भुज में भूकंप के बाद इसी डिवाइस पर आधारित इमारते बनाई गईं हैं, जो सामान्य भूकंप के झटके को आसानी से सह सकती हैं।

क्या करें भूकंप के दौरान
भूकंप के दौरान जितना संभव हो सुरक्षित स्थान पर रुकें। ध्यान रखें कि अधिकतर भूकंप कम समय के लिए आते हंै। भूकंप आते ही खुद को सुरक्षित रखने के लिए निम्नलिखित कदम उठायें-

यदि अंदर हैं तो
किसी मेज के नीचे बैठ जाएं अथवा किसी फर्नीचर या लकड़ी के तख्ते से खुद को कवर कर लें। इस अवस्था में तब तक बैठे रहें जब तक कि भूकंपन खतम न हो जाए। यदि टेबल या फर्नीचर न हो तो कमरे के कोने में बैठकर अपने हाथों से चेहरे व सिर को ढक लें।
कांच की खिड़कीयों, बाहरी दरवाजों और बिजली के उपकरण जो से दूर रहें।
अगर आप पलंग पर हैं तो वहीं रहें और अपने सिर को तकिए से कवर करें। यदि आप किसी ऐसी चीज के नीचे हैं जो गिर सकती है तो किसी नजदीकी सुरक्षित स्थान पर जाएं।
यदि आप जानते हैं कि दरवाजे की चौखट मजबूत है और भार संभाल सकती है तो उसकी ओट लें।
तब तक अंदर रहें जब तक कि भूकंप रुक न जाए और बाहर निकलना सुरक्षित न हो जाए। यह सिद्ध हो चुका है कि सबसे ज्यादा दुर्घटनाएं तब होती है जब लोग बाहर की ओर या बिल्डिंग में ही इधर-उधर भागते हैं।
ध्यान रखें कि बिजली चली गई हो और फव्वारे और फायर अलार्म चालू हों।
लिफ्ट आदि का उपयोग न करें।

यदि बाहर हैं तो यदि आप घर से बाहर हैं तो वहीं रुकें।
इमारतों, स्ट्रीट लाइटों और बिजली के तारों से दूर रहें।
यदि खुले में हैं तो भूकंप रुकने तक वहीं ठहरें। सबसे ज्यादा खतरा इमारतों के ठीक बाहर होता है, बाहरी दरवाजों पर या बाहरी दीवारों के निकट।

गाड़ी चलाते वक्त
जितनी जल्दी हो रुक जाएं और गाड़ी के अंदर रहें। इमारत के समीप, पेड़ के नीचे, फ्लाईओवर के नीचे और बिजली की तारों के नीचे रुकने से बचें।
सावधानी से आगे बढ़ें। उन सड़कों, पुलों और ढलानों से बचें जोकि भूकंप से क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।

यदि मलबे के नीचे दबे हैं
माचिस न जलाएं
मलबे में हिलें और ढकेले नहीं।
अपने मुंह को रुमाल या कपड़े से ढकें।
पाइप अथवा दीवार पर ठकठकाएं ताकि सुरक्षा दल आपको ढूंढ सकें। यदि सीटी है तो उसका उपयोग करें। केवल तभी चिल्लाएं जब कोई और चारा न हो। चिल्लाने से आपके मुंह में धूल जा सकती है.

हिंसक कौन? मनुष्य या फिर बाघ?

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव जिले के पास जिस बर्बरता से एक बाघिन को पीट-पीटकर मार डाला गया, वह घटना न सिर्फ दिल दहला देने वाली है, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर चल रहे बाघ संरक्षण के तमाम सरकारी एवं गैरसरकारी प्रयासों को एक गंभीर झटका भी है।

यह घटना इस बात को भी रेखांकित करती है कि मनुष्य कितना निर्दयी होता जा रहा है और बाघ कितना बेबस, बेसहारा और अकेला। जिस तरीके से करीब दस हजार लोगों ने कुल्हाड़ी, दराते, पत्थर और डंडों से उस निरीह, थकी हुई बाघिन पर आक्रमण किया, वह कृत्य अमानवीय से भी अधिक घृणित कहा जाएगा।

देश भर के वन्यप्राणी संरक्षक तथा बाघप्रेमी इस घटना से अवाक हैं, दुखी हैं। इस घटना से उपजे नए प्रश्नों के जवाब तमाम सरकारों और बाघप्रेमियों को तलाशने होंगे। छत्तीसगढ़ शासन की जांच में कई नई बातें सामने आएंगी।

बखरूटोला छोटा-सा गांव है, जो छुरिया नगर पंचायत के अंतर्गत आता है। यह आदिवासी-पिछड़ा क्षेत्र है, जहां धान की खेती होती है। कुछ ही किलोमीटर पर महाराष्ट्र का गोंदिया जिला है। राजनांदगांव से सटे हुए महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित चंद्रपुर और गढ़चिरोली जिले जंगलों से भरपूर हैं।

यही सारा इलाका बाघों का अपने हक का असली बसेरा है। किंतु छुरिया या बखरूटोला जैसे छोटे गांवों में बाघ का आना-जाना नहीं था। ऐसा बताया जाता है कि यहां के लोगों ने पहली दहाड़ 9 जुलाई को सुनी थी। उसके बाद 15 सितंबर को मुड़मारी (महाराष्ट्र) गांव में एक वृद्ध महिला को इस बाघिन ने हमला कर मार गिराया।

इसके बाद कुछ मवेशियों पर भी उसने हमला किया था। इसी कारण क्रुद्ध लोगों ने बाघिन को घेरा और खदेड़ा। जब वह थककर दलदल में फंस गई, तब उस पर अत्यंत क्रूरतापूर्वक हमला बोल दिया.. उसकी पूंछ काट दी, दांत तोड़ दिए एवं आंखें फोड़ दीं।

छत्तीसगढ़ वन विभाग के अधिकारियों एवं पुलिस की मौजूदगी में यह हादसा हुआ। वे देखते रह गए। शिकार पर पाबंदी से पूर्व के दिनों में शिकारियों द्वारा मारे गए बाघों से कहीं अधिक निर्दयता से इस हत्या को अंजाम दिया गया। वह बाघिन नरभक्षी नहीं थी, यह जान लेना भी जरूरी है।

बखरूटोला सिर्फ 2,000 की जनसंख्या का गांव है। इस गांव में 10,000 लोगों की भीड़ इकट्ठा होना और राष्ट्रीय पशु को निर्ममता से मार डालना निश्चित ही हर समझदार व संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाली घटना है।

बाघिन को मारने के लिए पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र से भी बड़ी संख्या में लोग छत्तीसगढ़ में घुस आए थे। गांव वालों के मन में जो गुस्सा खदबदा रहा था, उसे ठंडा करने के सामयिक उपाय छत्तीसगढ़ वन विभाग ने क्यों नहीं किए?

देश में 1973 में ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की शुरुआत की गई थी। सोच थी कि बाघों की घटती संख्या को थामा जाए और जंगल के इस नायाब प्राणी की रखवाली के पुख्ता इंतजाम किए जाएं। लेकिन बाघों के लगातार सफाए के साथ ही ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की नाकामी जगजाहिर हो गई।

फिर 2005-2006 में राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण बनाया गया, जिसके लिए करोड़ों रुपयों का बजट भी दिया गया। राज्यों में भी बाघ संरक्षण के प्रति जागरुकता बढ़ी। पर्यटन के प्रति बढ़ती रुचि और विभिन्न राष्ट्रीय उद्यानों जैसे कान्हा, बांधवगढ़, सुंदरवन, ताडोबा, रणथम्भौर में पर्यटकों की बढ़ती संख्या बताती है कि बाघों के प्रति जनमानस में आकर्षण एवं लगाव बढ़ा है।

इस सुंदर प्राणी को प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्र की धरोहर कहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह माना जा रहा है कि यदि बाघ बचेगा तो सिर्फ भारत में ही। मध्यप्रदेश के पन्ना में वर्ष 2004-05 के बाद बाघ गायब हो गए। यह बड़ी त्रासदी थी, ठीक सरिस्का जैसी।

किंतु मध्य प्रदेश ने वह कमाल कर दिखाया, जिसने असंभव को संभव में बदल दिया। अब पन्ना में बाघ हैं और बढ़ भी रहे हैं। लगातार निगरानी, संरक्षण के नित नए उपाय, जनता और राजनेताओं में बढ़ती समझ के कारण बाघों की संख्या अब 1411 से बढ़कर करीब 1700 तक पहुंच गई है।

सरिस्का घटित होने के बाद प्रधानमंत्री ने सुनीता नारायण की अध्यक्षता में टाइगर टास्क फोर्स गठित की, जिसने कई व्यावहारिक सुझाव दिए। कुछ पर अमल हुआ, कुछ पर विवाद हुए और कुछ वैसे ही कागज पर रह गए।

टास्क फोर्स एवं अन्य विषय विशेषज्ञों ने बाघ और मनुष्य के टकराव को खत्म करने की बात की थी। वह कैसे हो, इस पर बाघ विशेषज्ञ एकमत नहीं हैं। बाघ-मनुष्य एक-दूसरे के प्रति सहिष्णु कैसे हो सकते हैं, इस पर भी बातें हुई थीं।

नई नीतियां बनीं, नए नियम बने। बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने आर्थिक पैकेज बनाया, जिससे बाघ क्षेत्र से हटाए जाने वाले परिवारों को कुछ लाख रुपए तक अब दिए जा रहे हैं। बाघ द्वारा मवेशी खाने पर, आदमी को जख्मी करने अथवा मार डालने पर भी काफी रकम दी जा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ के वन विभाग के अफसरों का यह कहना कि भीड़ इतनी नाराज थी कि बाघिन को बचाया नहीं जा सका, दुखद है।

व्यवस्थित योजनाबद्ध तरीके से उसे बेहोश (ट्रैंक्विलाइज) किया जा सकता था। वह बाघिन करीब 45 दिनों से उस क्षेत्र में घूम रही थी। उसने मवेशियों पर हमला किया था अर्थात उसके भोजन के पूरे इंतजाम उस क्षेत्र में नहीं थे। उसके कुछ दिन पूर्व बीमारी के चलते उसे चंद्रपुर में पिंजरे में रखा गया था।

आम तौर पर बाघ मानव बस्ती से दूर ही रहता है। स्वभाव से बाघ शांतिप्रिय है और भोजन मिलता रहे तो मनुष्य की तरफ नजर उठाकर वह देखता तक नहीं है। बाघ अभयारण्यों के बाहर भी सुरक्षित रहें, वहां बफर जोन बनें, बाघों के विचरण हेतु लंबे कॉरिडोर की सुरक्षा हो, ग्रामीणों को वृहत स्तर पर शिक्षित किया जाए कि बाघ मनुष्य का दुश्मन नहीं है, यह सब बहुत आवश्यक है, जिससे ऐसी दुर्घटनाएं न हों।

त्रासदी यह है कि मनुष्य समझदार, शिक्षित होकर भी जनसंख्या पर संयम नहीं रख रहा है और बाघों के बसेरों को उजाड़ता जा रहा है। बाघ लगातार अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है। राजनांदगांव की दर्दनाक घटना ने एक बार फिर दोहराया है कि मनुष्य स्वार्थी और असंवेदनशील होता जा रहा है। दुर्गा पूजा के ठीक पहले मां दुर्गा का वाहन भारत जैसे संस्कारवान देश में मार दिया गया था। इसे क्या कहें?

सावधान! आप सब्जी नहीं 'जहर' खा रहे हैं

सावधान! आप सब्जी नहीं 'जहर' खा रहे हैं

बेमौसम हरी-भरी सब्जियों के देख कर मन प्रसन्न हो जाता है। बैंगनी बैंगन और हरे मटर को देख जी ललचा उठता है। पर क्या हमने कभी सोचा है कि प्रकृति के विरुद्ध जाकर हम जो काम करते हैं, उसका साइड इफेक्ट क्या होता है? नहीं हमारे पास इतनी फुर्सत कहां जो अपने हेल्थ के बारे में सोच सकें। पर नहीं जनाब इस घटना और जानकारी के जानने के बाद आप सोचने पर मजबूर हो जाएंगे।

बुलंदशहर जिले में एक परिवार ने बड़े चाव से आलू दम की सब्जी बनाई और खाया। उस रात परिवार के सदस्यों की हालत बिगड़ गई। अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां दो लोगों की मौत हो गई। डॉक्टरों ने मौत की वजह पता लगाई तो होश उड़ गए। दोनों लोगों की मौत आलू की सब्जी खाने से हुई थी। इस तरह हमारे किचन में आने वाली हर सब्जी में जहर होने की संभावना बनी रहती है।

देश में खेती की जगह कम और जनसंख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में ज्यादा पैदावार बढ़ाने के लिए किसान सब्जियों में केमिकल और किटनाशक धड़ल्ले से डाल रहे हैं। इनसे सब्जी में जहर तेजी से घुल रहा है और हमें मीठी मौत दे रहा है।

सब्जी नहीं केमिकल खा रहे हैं हम
सब्जियों में पाए जाने वाले पेस्टिसाइड और मेटल्स पर अलग-अलग शोध किया गया। शोध के अनुसार सब्जियों के साथ हम कई प्रकार के पेस्टिसाइड और मेटल खा रहे हैं। इनमें केडमियम, सीसा, कॉपर और क्रोमियम जैसी खतरनाक धातुएं और एंडोसल्फान, एचसीएच व एल्ड्रिन जैसे घातक पेस्टीसाइड शामिल हैं।

सब्जियों के साथ शरीर में जाकर ये स्वास्थ्य को भारी नुकसान पहुंचाती हैं। सब्जियां तो हजम हो जाती हैं लेकिन यह जहर शरीर के विभिन्न संवेदनशील अंगों में जमा होता रहता है। इससे उल्टी-दस्त, किडनी फेल, कैंसर जैसी बीमारियां सामने आती हैं। पालक, आलू, फूल गोभी, बैंगन, टमाटर आदि में इस तरह का जहर पाया गया है। शोध के अनुसार खेतों में फसलों पर रासायनिक पेस्टिसाइड का उपयोग बहुतायत में किया जा रहा है।

इस रासायनिक जहर में एंडोसल्फान जैसे खतरनाक पेस्टिसाइड का उपयोग आम है। प्रभुदान चारण ने टमाटरों के 28 नमूनों का निरीक्षण किया, जिनमें से 46.43 प्रतिशत नमूनों में पेस्टिसाइड ज्यादा पाया गया। भिंडी के 25 में से 32, आलू के 17 में से 23.53, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैंगन के 46 में से 50 प्रतिशत नमूने प्रदूषित पाए गए। फूल गोभी सर्वाधिक प्रदूषित पाई गई, जिसके 27 में 51.85 प्रतिशत नमूनों में यह जहर था।

फूलगोभी सबसे ज्यादा है प्रदूषित
खेतों में फसलों पर रासायनिक पेस्टिसाइड का उपयोग बहुतायत में किया जा रहा है। इस रासायनिक जहर में एंडोसल्फान जैसे खतरनाक पेस्टिसाइड का उपयोग आम है। टमाटरों के 28 नमूनों में से 46.43 प्रतिशत नमूनों में पेस्टिसाइड ज्यादा पाया गया। भिंडी के 25 में से 32, आलू के 17 में से 23.53, पत्ता गोभी के 39 में से 28, बैंगन के 46 में से 50 प्रतिशत नमूने प्रदूषित पाए गए। फूल गोभी सर्वाधिक प्रदूषित पाई गई, जिसके 27 में 51.85 प्रतिशत नमूनों में यह जहर था।

ये हो सकती हैं ये बीमारियां
सब्जियों के साथ शरीर में जाकर एंडोसल्फान, एचसीएच व एल्ड्रिन जैसे पेस्टिसाइड वसा उत्तकों में जम जाते हैं। बायोमैनीफिकेशन प्रक्रिया से शरीर में इनकी मात्रा बढ़ती रहती है। यह लंग्स, किडनी और कई बार दिल को सीधा नुकसान पहुंचाते हैं। इनकी अधिक मात्रा जानलेवा बन जाती है।

इसी तरह मेटल के कारण भी कई गंभीर बीमारियों का खतरा रहता है। केडमियम धातु लीवर, किडनी में जमा होकर इन्हें डेमेज करती है। यह धातु प्रोटीन के साथ जुड़कर उसका असर खत्म कर देता है। इससे कैंसर का खतरा रहता है। इटाई-इटाई नामक बीमारी होने से हड्डियां मुड़ जाती हैं। इस बीमारी को ब्रिटल बोन भी कहा जाता है। जापान में सबसे पहले यह तथ्य सामने आया था, जहां इसे इटाई-इटाई नाम दिया गया।

जिंक से उल्टी-दस्त, घबराहट होना आम है। ज्यादा मात्रा में जमा होने पर लीवर पैन की शिकायत हो जाती है। ज्यादा मात्रा होने पर इसे जिंकचीली कहा जाता है। सीसा की मात्रा शरीर में ज्यादा होने पर असहनीय दर्द होता है। किडनी पर इसका असर सीधा होता है और वह फेल हो सकती है। मानसिक संतुलन भी बिगड़ सकता है। खून में इसकी मात्रा बढ़ने पर एनिमिया हो जाता है। लीवर को भी यह प्रभावित करता है। इससे लकवा होने की आशंका भी रहती है। क्रोमियम से चर्मरोग व श्वास संबंधी बीमारियों के साथ शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता खत्म होने की समस्या रहती है।

कैंसर होने की संभावना भी बनती है। कॉपर से एलर्जी, चर्मरोग, आंखों के कॉर्निया का प्रभावित होना, उल्टी-दस्त, लीवर डेमेज, हाइपर टेंशन की शिकायत मिलती है। मात्रा बढ़ने पर व्यक्ति कोमा में भी जा सकता है। हिमोग्लोबिन के साथ जुड़कर यह उसे कम कर देता है।

Saturday, October 1, 2011

indian media

कहा जाता है की  मीडिया लोकतंत्र का चोथा सतम्भ है मगर  एक दूसरा पहलु भी है और वो है इसका टेलीकास्ट करने का तरीका जैसा की आप सभी को पता है २००२ के गुजरात दंगो में मीडिया की भूमिका पर सवाल उठे अटल बिहारी जी ने उस वक़्त  बैन लगवा दिया था जिसमे लोगो के जले हुआ सर और लाशे दिखा कर अपना मीडिया waah waahi लूट रहा tha  कुछ लोगो ने तो यही मन की ये दंगे मीडिया की वजह से ज्यादा हो गये थे सायद सही भी है लोग जो देखते और सुनते हैं ऐसी बात  पर यकीं भी जल्दी कर लेते हैं २. २६/११ को मुम्बई पर  रात को हमला हुआ तो सभी सिक्यूरिटी अपना अपना काम कर रही थी मगर मीडिया ने जो टेलेकास्ट किया उसके कारन ये मामला ३ दिन तक चला वजह थी मीडिया ने पूरे होटल और बॉम्बे सिटी का mep दिखाना  उसके वजह se terreriost सतर्क हो गये थे और वो पल पल की जानकारी टीवी पर देख रहे थे ये तो देश को सुबह होश आया और होटल की लाइन काटी गयी मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी और १०० से jayada लोग मरे भी जा चुके थे
और उनके आका पकिस्तान में बैठ कर इसका मज़ा ले रहे थे और देश के दिल पर एक और ज़ख़्म दिया जा चूका था