एक जर्नल के पन्ने पलटते हुए नजर छोटे-से विज्ञापन पर गई। विज्ञापन के सबसे निचले हिस्से पर लिखा हुआ था - ‘कपूर एंड डॉटर्स’। अब तक शर्मा एंड संस, गुप्ता एंड संस, ठाकुर एंड संस जैसे फर्मो के नाम देखने की ही आदत रही है। इसलिए यह छोटा-सा बदलाव सुखद भी था और प्रतीकात्मक भी।
बदलाव बाबा आदम के जमाने से चले आ रहे हैं। इतिहास कई बड़े बदलावों का साक्षी रहा है। लेकिन बदलाव वे ही नजर आते हैं, जो भौतिक रूप से घटित होते हैं। जैसे 64 साल पहले लाल किले पर तिरंगे का लहराना। बड़ा राजनीतिक बदलाव। साफ नजर आया। हाल के वर्षो में कार्यस्थलों पर महिलाओं की संख्या का बढ़ना। महिलाएं कार्यस्थलों पर दिख रही हैं। इसलिए माना जा सकता है कि बदलाव हुआ है, एक बड़ा सामाजिक बदलाव। लेकिन दिमाग के भीतर बदलाव न तो इतनी आसानी से होता है और न ही साफ नजर आता है। क्या बेटियों या महिलाओं के प्रति जो नजरिया है, वह बदला है? केवल पुरुषों के दिमाग मंे ही नहीं, महिलाओं के दिमाग में भी। इसलिए किसी फर्म के साथ अगर ‘डॉटर्स’ शब्द जुड़ता है तो यह भौतिक बदलाव के साथ-साथ शायद मानसिकता में बदलाव का भी संकेत है। हालांकि यह पर्याप्त नहीं है।
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के चंबल क्षेत्र के कुछ गांवों के भ्रमण का मौका मिला। यह क्षेत्र लड़कियों के साथ भेदभाव के लिए बदनाम रहा है। आंकड़े अक्सर इसकी पुष्टि करते हैं। लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कम हो रही है। कन्या पैदा ही नहीं हो, इसके लिए कई तरह के जतन किए जाते हैं। छोटी-छोटी कन्याओं को किस तरह से मारा जाता है, इसे लेकर क्षेत्र में कई कहानियां प्रचलित हैं। लड़के के पैदा होने पर जश्न-सा माहौल होता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि बेटा पैदा होने पर ‘चरुआ’ मनाया जाता है। इसमें चौदह दिनों तक लड़के की मां को पोषण तत्वों से युक्त पदार्थ खिलाए जाते हैं। लेकिन लड़की होने पर लगता है मानो परिवार मंे गमी हो गई हो।
बच्ची की मां भी ‘आत्मग्लानि’ में तीसरे-चौथे दिन से काम में जुट जाती है। इसके पीछे निश्चित तौर पर ऐतिहासिक कारण रहे होंगे, लेकिन लगता है वे सामाजिक परिस्थितियों के साथ रच-बस गए हैं। यही परिस्थितियां बेटों के प्रति ललक को न्यायसंगत ठहराती हंै और यह सिलसिला लगातार चलता जाता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं, परिस्थितियां और उनके तर्क अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन घर में पैदा होने वाली बेटी को ‘लक्ष्मी’ कहने के बावजूद अधिकांश लोगों में यह मलाल अक्सर रहता है कि काश, लड़का होता!
कुछ चीजें शायद कभी नहीं बदलेंगी। जैसे विदाई हमेशा लड़की की होगी, लड़के की नहीं। सुरक्षा से जुड़ी दिक्कतें भी प्राय: लड़कियों के साथ ही रहेंगी। शायद दहेज जैसी सामाजिक बुराइयां भी आने वाले सालों में लड़कियों के माता-पिता के लिए समस्या बनी रहेंगी। लेकिन फिर भी बहुत कुछ बदला जा सकता है। अगर महिलाओं के प्रति सामाजिक बोध बदला जा सके, तो कन्या पूजन के लिए नवरात्रि के नौ दिनों का इंतजार करने की जरूरत नहीं रहेगी। हिंदी बेल्ट के एक मुख्यमंत्री बेटी बचाओ अभियान शुरू कर रहे हैं।
अच्छी बात है, लेकिन सच तो यह है कि सामाजिक समस्याओं के समाधान सरकारी अभियानों में नहीं होते। स्वयं समाज ही इसका समाधान हो सकता है। आज की बेटी, जो कल मां भी होगी और सास भी, के जिम्मे भी आने वाली बेटियों का सम्मान और अस्मिता रहेगी।
और चलते-चलते.. मेरे मित्र की एक बेटी है। उससे वे बहुत प्यार करते हैं। वे अक्सर कहते हैं, मेरे लिए तो यह बेटे जैसी है। क्या हमारा कोई मित्र कभी अपने बेटे के लिए यह कह सकेगा, यह तो मेरी बेटी जैसा है!
http://www.bhaskar.com/article
बदलाव बाबा आदम के जमाने से चले आ रहे हैं। इतिहास कई बड़े बदलावों का साक्षी रहा है। लेकिन बदलाव वे ही नजर आते हैं, जो भौतिक रूप से घटित होते हैं। जैसे 64 साल पहले लाल किले पर तिरंगे का लहराना। बड़ा राजनीतिक बदलाव। साफ नजर आया। हाल के वर्षो में कार्यस्थलों पर महिलाओं की संख्या का बढ़ना। महिलाएं कार्यस्थलों पर दिख रही हैं। इसलिए माना जा सकता है कि बदलाव हुआ है, एक बड़ा सामाजिक बदलाव। लेकिन दिमाग के भीतर बदलाव न तो इतनी आसानी से होता है और न ही साफ नजर आता है। क्या बेटियों या महिलाओं के प्रति जो नजरिया है, वह बदला है? केवल पुरुषों के दिमाग मंे ही नहीं, महिलाओं के दिमाग में भी। इसलिए किसी फर्म के साथ अगर ‘डॉटर्स’ शब्द जुड़ता है तो यह भौतिक बदलाव के साथ-साथ शायद मानसिकता में बदलाव का भी संकेत है। हालांकि यह पर्याप्त नहीं है।
पिछले दिनों मध्यप्रदेश के चंबल क्षेत्र के कुछ गांवों के भ्रमण का मौका मिला। यह क्षेत्र लड़कियों के साथ भेदभाव के लिए बदनाम रहा है। आंकड़े अक्सर इसकी पुष्टि करते हैं। लड़कों की तुलना में लड़कियों की संख्या कम हो रही है। कन्या पैदा ही नहीं हो, इसके लिए कई तरह के जतन किए जाते हैं। छोटी-छोटी कन्याओं को किस तरह से मारा जाता है, इसे लेकर क्षेत्र में कई कहानियां प्रचलित हैं। लड़के के पैदा होने पर जश्न-सा माहौल होता है। स्थानीय लोग बताते हैं कि बेटा पैदा होने पर ‘चरुआ’ मनाया जाता है। इसमें चौदह दिनों तक लड़के की मां को पोषण तत्वों से युक्त पदार्थ खिलाए जाते हैं। लेकिन लड़की होने पर लगता है मानो परिवार मंे गमी हो गई हो।
बच्ची की मां भी ‘आत्मग्लानि’ में तीसरे-चौथे दिन से काम में जुट जाती है। इसके पीछे निश्चित तौर पर ऐतिहासिक कारण रहे होंगे, लेकिन लगता है वे सामाजिक परिस्थितियों के साथ रच-बस गए हैं। यही परिस्थितियां बेटों के प्रति ललक को न्यायसंगत ठहराती हंै और यह सिलसिला लगातार चलता जाता है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग परंपराएं, परिस्थितियां और उनके तर्क अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन घर में पैदा होने वाली बेटी को ‘लक्ष्मी’ कहने के बावजूद अधिकांश लोगों में यह मलाल अक्सर रहता है कि काश, लड़का होता!
कुछ चीजें शायद कभी नहीं बदलेंगी। जैसे विदाई हमेशा लड़की की होगी, लड़के की नहीं। सुरक्षा से जुड़ी दिक्कतें भी प्राय: लड़कियों के साथ ही रहेंगी। शायद दहेज जैसी सामाजिक बुराइयां भी आने वाले सालों में लड़कियों के माता-पिता के लिए समस्या बनी रहेंगी। लेकिन फिर भी बहुत कुछ बदला जा सकता है। अगर महिलाओं के प्रति सामाजिक बोध बदला जा सके, तो कन्या पूजन के लिए नवरात्रि के नौ दिनों का इंतजार करने की जरूरत नहीं रहेगी। हिंदी बेल्ट के एक मुख्यमंत्री बेटी बचाओ अभियान शुरू कर रहे हैं।
अच्छी बात है, लेकिन सच तो यह है कि सामाजिक समस्याओं के समाधान सरकारी अभियानों में नहीं होते। स्वयं समाज ही इसका समाधान हो सकता है। आज की बेटी, जो कल मां भी होगी और सास भी, के जिम्मे भी आने वाली बेटियों का सम्मान और अस्मिता रहेगी।
और चलते-चलते.. मेरे मित्र की एक बेटी है। उससे वे बहुत प्यार करते हैं। वे अक्सर कहते हैं, मेरे लिए तो यह बेटे जैसी है। क्या हमारा कोई मित्र कभी अपने बेटे के लिए यह कह सकेगा, यह तो मेरी बेटी जैसा है!
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